आखिर क्यों जरूरी है बस्ती का नाम बदल कर वशिष्ठ नगर कर देना?
राहुल सांकृत्यायन
उत्तर प्रदेश में जल्द ही एक और जिले का नाम बदला जा सकता है. जिले का नाम है बस्ती. बस्ती यानी अयोध्या से कम से कम 68 किलोमीटर दूर औऱ गोरखपुर से 67 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जिले का नाम अब या तो वशिष्ठी (Vasisthi) हो जाएगा या फिर वशिष्ठनगर (vasistha nagar). बस्ती से दूर रहने वाले लोगों को लग रहा होगा कि क्या शानदार काम हो रहा है.
यूपी छोड़कर या यूं कहें कि पूर्वांचल छोड़ते ही जब कोई पूछता है तो जिले का नाम बताने में बहुतेरों को शर्म आती है. ऐसे में लोग अयोध्या के आगे और गोरखपुर के बीच में बसा एक जिला बताते हैं. बहुत दिनों से मांग थी कि जिले का नाम बदल दिया जाए. माना जाता है कि जिले का नाम पहले वशिष्ठी था. बिगड़ते बिगड़ते बस्ती हो गया.
साल 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार आने के बाद से कई जिलों के नाम बदले गए. कई के प्रस्तावित हैं. बात बस्ती की करें तो फेसबुक लोगों की जद में आया तो तमाम फेसबुक पेज और ग्रुप्स बनें जिनमें बस्ती का नाम बदल कर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु, गुरु वशिष्ठ के नाम पर रखने की मांग की गई थी. उसके बाद मेरे जैसे हाईस्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी लगा कि जिले का नाम कुछ और होना था लेकिन है कुछ और. फिर बड़े पैमाने पर लोगों ने इसकी मांग शुरू कर दी.
जब राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई तो यह ट्रेंड आम हो गया. इलाहाबाद, प्रयागराज हो गया, फैजाबाद- अयोध्या हो गया. कई सारे प्रस्ताव तो सरकार की झोली में पड़े हुए हैं. हो सकता है कि समयानुसार उनका निपटारा किया जाये.
यह भी पढ़ें: जल्द ही बदल दिया जाएगा बस्ती का नाम! शासन को भेजा गया प्रस्ताव
यह भी पढ़ें: Uttar Pradesh Panchayat Chunav: चुनाव पर सस्पेंस जारी, योगी सरकार के मंत्री बोले- कोर्ट के आदेश का इंतजारक्या कोई अपने मां-पिता का नाम बदल देता है?
अब बात करते हैं नाम बदलने के वजहों की. मुझे लगता है कि आप सभी पाठक , कभी ना कभी जिला अस्पताल गये होंगे. किसी ना किसी डॉक्टर के चेंबर के सामने दरवाजे से झांकते हुए अपनी बारी का इंतजार भी किया होगा. इस दौरान आपका नाम आने से पहले और आने के बाद कई ऐसे नाम पुकारे गए होंगे जिन्होंने आपको हंसने पर मजबूर किया होगा लेकिन अपनी या अपने किसी साथी की बीमारी की वजह से आप गंभीर बने रहे हों. मसलन किसी का नाम छुहारा देवी पुकारा गया होगा या कभी बदामी देवी! आपने कभी खेमई सुना होगा या फिर सुखई.
यह वो नाम है जो पुराने जमाने के हैं. नये जमाने के नाम में नीलम, प्रतिभा, प्रमिला, राहुल, गौरव, राजीव शामिल थे. उसके बाद जो नया जमाना आया उसमें नाम नवल , दीप्ति, अक्षरा होता है. आगे के समय में कई और नाम हमारे सामने आएंगे. नामों का बदलते रहना हमारी पीढ़ी और साक्षरता पर निर्भर करता है.

मुझे नहीं लगता कि कभी छुहारा देवी के बेटे या खेमई की बेटी ने अपने परिजन का नाम बदलने की दरख्वास्त की हो. वह अपने मां-पिता के नाम से संतुष्ट थे. घर की जिन्दगी में भी और बाहरी जिन्दगी में भी. क्या इनके मन में कभी आया होगा कि अगर उनके परिजन का नाम यह नहीं वह होता तो कितना अच्छा होता. हो सकता है कि उनके दिमाग में यह बात आई हो लेकिन वह इस बात को सिरे से खारिज कर देते रहे होंगे कि आखिर लोग उन्हें छुहारा देवी के बेटे या सुखई की बिटिया के ना्म से जानते हैं. आखिर वह अपने परिजन की आइडेंटिटी के साथ खिलवाड़ कैसे कर दें?
हमें शर्म आती है अपने जिले का नाम लेने में!
जब हम अपने परिजनों का नाम नहीं बदल सकते क्योंकि उससे हमारी आईडेंटिटी पर असर पड़ेगा तो हम क्यों जिलों का नाम बदलने की सिफारिश करते हैं? क्या हमने कभी अपनी जन्मभूमि को अपना हिस्सा नहीं माना या हमें शर्म आती है अपने जिले का नाम लेने में! कभी पूछिएगा किसी सुखई या खेमई के बेटा-बेटी से क्या उन्हें अपने पिता के नाम में कोई दिक्कत नजर आती है? क्या वह इसे बदलना चाहते हैं? वह इस बात को सिरे से खारिज करते हुए शायद आपको दो-चार बाते सुना दें.

अक्सर आपको कोई ना कोई यह कहते हुए मिल जाएगा कि लोग बस्ती नाम सुनते ही कोई झुग्गी झोपड़ी समझ लेते हैं. इसलिए नाम बदलना जरूरी है. मुझे सिर्फ एक बात का जवाब दीजिए कि सिर्फ आजादी से ही अगर जोड़ें तो अगर आप 73 साल में किसी जिले का नाम देश भर में नहीं फैला सके वह भी तब जबकि देश के कोन-कोने में आप रहते हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि नया नाम होने के बाद सिवाय चंद दिन खबरों में रहने के आपके जिले का नाम रोशन हो जाएगा? क्या इस बात की गारंटी कोई दे सकता है कि जिन समस्याओं से फिलहाल बस्ती जूझ रही है क्या उन सभी समस्याओं का निदान हो जाएगा? अगर हां तो 20 बार नाम बदल दीजिए लेकिन अगर आप कोई गारंटी नहीं दे सकते तो इलेक्टेड नेताओं और सेलेक्टेड अफसरों को इसका कोई अधिकार नहीं है कि वह किसी जिले के इतिहास से छेड़छाड़ करें.
जिन जिलों के नाम बदले गये क्या उनके पुराने नाम खत्म हो गये?
जो आज सांसद हैं, विधायक है या आज जिले के कमिश्नर और डीएम हैं क्या उन्हें इस बात का इल्म भी है कि उनके बगल के ही दो जिलों के नाम बदल दिये गए थे लेकिन आज भी लोग पुराने नाम से ही याद रखते हैं. नौगढ़, बांसी और डुमरियागंज को लोग सिद्धार्थनगर नहीं बुलाते. पुराना नाम लोगों की जुबां पर चढ़ा हुआ है. खलीलाबाद को लाख आपने संतकबीरनगर कह दिया लेकिन गोरखपुर से गोंडा जाने वाली सवारी गाड़ी वाया खलीलाबाद होकर ही जाती है. ज्यादा दूर क्यों जाना गांधी नगर स्थित तुरकहिया का नाम बदलकर शिवनगर किया गया लेकिन आज भी लोग तुरकहिया ज्यादा याद रखते हैं. ज्यादा हुआ तो शिवनगर तुरकहिया बोल दिया. आखिर नाम बदल कर हासिल क्या हुआ?
राजस्व बोर्ड को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि नाम बदलने में 1 करोड़ रुपए खर्च होंगे. 1 करोड़ किसी सरकार के लिए बड़ी रकम नहीं हैं. लेकिन क्या यह रकम सिर्फ जिले का नाम बदलने के लिए ही खर्च किया जाये. आखिर कभी किसी ने जिले के बीचोबीच स्थित अंबिका प्रताप नारायण पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कॉलेज की हालत ठीक करने की बात क्यों नहीं की? कभी किसी ने किसान डिग्री कॉलेज की हालत का जिक्र क्यों नहीं किया? क्यों नहीं किसी ने कभी इस बात का जिक्र किया शहर की सीमा पार होते ही सड़क टूट चुकी है. अगर मजबूरी ना हो तो सरकारी बस, मुंडेरवा हो कर नहीं जाती. तस्वीर जहन में याद हो तो आपको पता होगा कभी नेता लोग क्षय रोग अस्पताल के पास सड़के गड्ढे में धान की रोपाई करते थे.

अच्छा यह सब छोड़िए, आपको लगेगा कि मैं काफी नकारात्मक बात लिख रहा हूं. जिले में शहरी सीमा के भीतर नई बस्ती और पुरानी बस्ती है तो क्या वशिष्ठी या वशिष्ठनगर में नई बस्ती, नई वशिष्ठी हो जाएगा या पुरानी बस्ती को लोग पुरानी वशिष्ठी कहने लगेंगे? बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र की करें तो यहां तीन बाजार ऐसे हैं जिन्हें लोग दो-दो नामों से जानते हैं. पहला उर्दू बाजार जिसे हिन्दी बाजार भी कहा जाता है. अली नगर, जिसे आर्यनगर भी कहा जाता है. मियां बाजार को माया बाजार भी कहा जाता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इस आशय का दावा किया जाता है कि जब साल 1998 में योगी आदित्यनाथ पहली बार सांसद बने तो इन तीन नामों को बदला गया था.
यह भी पढ़ें: रंग लाई विधायक संजय प्रताप जायसवाल की पहल, होगा रूधौली-भानपुर सड़क का चौड़ीकरण
क्या वशिष्ठनगर या वशिष्ठी होने से खत्म हो जाएंगी बस्ती की समस्याएं?
अब कोई इस बात की भी जानकारी दे कि क्या भारतेंदु हरिश्चंद्र को साल 2020 में वापस लौट कर आना पड़ेगा और फिर उन्हें बस्ती को बस्ती कहूं तो काको कहूं उजाड़, को संपादित कर वशिष्ठी को वशिष्ठी कहूं तो काको कहूं उजाड़ करना पड़ेगा? सवाल यह नहीं है कि आप नाम बदल रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर इस नाम के साथ क्या बदलेगा? अगर आप आजादी के 73 साल बाद बस्ती को सम्मान नहीं दिला सके? बस्ती के सांसद रहे केशव देव मालवीय के प्लास्टिक कॉम्पलेक्स को नहीं बचा पा रहे हैं. जिले में प्राथमिक शिक्षकों की समस्याओं को दूर नहीं कर पा रहे हैं. शिक्षा का स्तर नहीं सुधार पा रहे हैं तो किस मुंह से नाम बदलने की ओर आगे बढ़ रहे है?
बस्ती की चीनी मिल की हालत किसी से छिपी नहीं है. पूर्व रेल मंत्री और फिलहाल रांची की एक जेल में सजा काट रहे लालू प्रसाद यादव के रेल बजट में स्मार्ट स्टेशन का दर्जा पाने वाला बस्ती रेलवे स्टेशन अभी तक विकास की बाट जोह रहा है. जो शहर और उसका प्रशासन अपने महोत्सव में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सरीखी हस्तियों भुला बैठे वह कैसे दावा कर सकता है कि नाम बदलने से हालात बदल जाएंगे?
मजे की बात देखिए जिले की वेबसाइट का क्या हाल है!
मजे की बात देखिये जिस जिले की वेबसाइट का इतिहास वीकिपीडिया से कॉपी किया गया जिसके दावों पर यकीन मुश्किल है और जिसे कोई भी लॉग इन कर अपडेट कर सकता है. जिलाधिकारी बदले हुए पांच महीने से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन कॉन्टैक्ट अस में अभी भी जिलाधिकारी के तौर पर पूर्व डीएम माला श्रीवास्तव का नाम दिख रहा है और वेबसाइट के होम पेज पर मौजूदा डीएम की तस्वीर लगी हुई है. अक्टूबर में ही यूपी सरकार ने यूपी पुलिस का डायल नंबर 100 की जगह 112 कर दिया लेकिन बस्ती एनआईसी पर अभी तक 100 नंबर की ही जानकारी दी जा रही है.
हकीकत की जमीन का भी ख्याल करें
अब आप तय करिए कि कैसे कोई अफसर या नेता यह तय कर सकता है कि आपके जिले का नाम क्या था और क्या होना चाहिए. हो सकता है कि नाम बदलने जाने के निर्णय से आप खुश हों लेकिन यह भी जरूर देखें कि आखिर इसका आपकी जिन्दगी पर क्या असर पड़ेगा. क्या जिले का नाम बदलने से शिक्षा प्रणाली सुधर जाएगी? क्या खटारा बसों का शिकार बस्ती डिपो एकदम चकाचक हो जाएगा? क्या सड़कें एकदम रवां हो जाएंगी और क्या आपकी प्रतिदिन की आय बढ़ जाएगी? वेबसाइट पर छोटी से छोटी चीजें जो अपडेट की जा सकती हैं वह पांच महीने में नहीं हो सकीं और कैसे कोई एकाएक आपके जिले का नाम बदल सकता है?


आप चाहें तो कह सकते हैं कि सारी समस्याएं अब क्यों याद की जा रही हैं? दरअसल, यह सारी समस्याएं पहले भी थीं. अब भी हैं. और यह तब तक रहेंगी जब तक हम और आप जागरुक नहीं होंगे. जिले का नाम बदलने में जो 1 करोड़ खर्च किये जाने की संभावना है, उनका बहुत छोटा सा हिस्सा इन कामों में लगाया जाता तो शायद यह लिखना नहीं होता. जरूरी नहीं है कि इस लेख में बहुत सारी बातें शामिल हो गई हों लेकिन यह जरूर ध्यान रखें कि जो भी छूट रहा वह आपको जरूर याद आए.
बेहतर हो कि जिला प्रशासन पहले समस्याओं से अवगत हो. नेता जनदबाव में काम जरूर करें लेकिन हकीकत की जमीन का भी ख्याल करें. शहर का नाम बदलने से पहले हालात बदलिए, यही हमारे भविष्य के लिए हितकर होगा. आखिर में एक सवाल के साथ आप सभी को छोड़े जाता हूं कि आखिर क्यों जरूरी है बस्ती का नाम बदल कर वशिष्ठ नगर कर देना?(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
आप हमसे यहां भी जुड़ सकते हैं.
अन्य खबरों के लिए क्लिक करें– https://bhartiyabastiportal.com/ पर.
Website – https://bhartiyabasti.com
Facebook – https://www.facebook.com/bhartiyabastidainik
Twitter – https://twitter.com/bhartiyabasti
YouTube –Bhartiya Basti
यह भी पढ़ें: बस्ती में होता था नकली नोट बनाने का काम! पुलिस ने किया खुलासा
आखिर क्यों जरूरी है बस्ती का नाम बदल कर वशिष्ठ नगर कर देना?
राहुल सांकृत्यायन
उत्तर प्रदेश में जल्द ही एक और जिले का नाम बदला जा सकता है. जिले का नाम है बस्ती. बस्ती यानी अयोध्या से कम से कम 68 किलोमीटर दूर औऱ गोरखपुर से 67 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जिले का नाम अब या तो वशिष्ठी (Vasisthi) हो जाएगा या फिर वशिष्ठनगर (vasistha nagar). बस्ती से दूर रहने वाले लोगों को लग रहा होगा कि क्या शानदार काम हो रहा है.
यूपी छोड़कर या यूं कहें कि पूर्वांचल छोड़ते ही जब कोई पूछता है तो जिले का नाम बताने में बहुतेरों को शर्म आती है. ऐसे में लोग अयोध्या के आगे और गोरखपुर के बीच में बसा एक जिला बताते हैं. बहुत दिनों से मांग थी कि जिले का नाम बदल दिया जाए. माना जाता है कि जिले का नाम पहले वशिष्ठी था. बिगड़ते बिगड़ते बस्ती हो गया.
साल 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार आने के बाद से कई जिलों के नाम बदले गए. कई के प्रस्तावित हैं. बात बस्ती की करें तो फेसबुक लोगों की जद में आया तो तमाम फेसबुक पेज और ग्रुप्स बनें जिनमें बस्ती का नाम बदल कर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु, गुरु वशिष्ठ के नाम पर रखने की मांग की गई थी. उसके बाद मेरे जैसे हाईस्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी लगा कि जिले का नाम कुछ और होना था लेकिन है कुछ और. फिर बड़े पैमाने पर लोगों ने इसकी मांग शुरू कर दी.
जब राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई तो यह ट्रेंड आम हो गया. इलाहाबाद, प्रयागराज हो गया, फैजाबाद- अयोध्या हो गया. कई सारे प्रस्ताव तो सरकार की झोली में पड़े हुए हैं. हो सकता है कि समयानुसार उनका निपटारा किया जाये.
यह भी पढ़ें: जल्द ही बदल दिया जाएगा बस्ती का नाम! शासन को भेजा गया प्रस्ताव
क्या कोई अपने मां-पिता का नाम बदल देता है?
अब बात करते हैं नाम बदलने के वजहों की. मुझे लगता है कि आप सभी पाठक , कभी ना कभी जिला अस्पताल गये होंगे. किसी ना किसी डॉक्टर के चेंबर के सामने दरवाजे से झांकते हुए अपनी बारी का इंतजार भी किया होगा. इस दौरान आपका नाम आने से पहले और आने के बाद कई ऐसे नाम पुकारे गए होंगे जिन्होंने आपको हंसने पर मजबूर किया होगा लेकिन अपनी या अपने किसी साथी की बीमारी की वजह से आप गंभीर बने रहे हों. मसलन किसी का नाम छुहारा देवी पुकारा गया होगा या कभी बदामी देवी! आपने कभी खेमई सुना होगा या फिर सुखई.
यह वो नाम है जो पुराने जमाने के हैं. नये जमाने के नाम में नीलम, प्रतिभा, प्रमिला, राहुल, गौरव, राजीव शामिल थे. उसके बाद जो नया जमाना आया उसमें नाम नवल , दीप्ति, अक्षरा होता है. आगे के समय में कई और नाम हमारे सामने आएंगे. नामों का बदलते रहना हमारी पीढ़ी और साक्षरता पर निर्भर करता है.

मुझे नहीं लगता कि कभी छुहारा देवी के बेटे या खेमई की बेटी ने अपने परिजन का नाम बदलने की दरख्वास्त की हो. वह अपने मां-पिता के नाम से संतुष्ट थे. घर की जिन्दगी में भी और बाहरी जिन्दगी में भी. क्या इनके मन में कभी आया होगा कि अगर उनके परिजन का नाम यह नहीं वह होता तो कितना अच्छा होता. हो सकता है कि उनके दिमाग में यह बात आई हो लेकिन वह इस बात को सिरे से खारिज कर देते रहे होंगे कि आखिर लोग उन्हें छुहारा देवी के बेटे या सुखई की बिटिया के ना्म से जानते हैं. आखिर वह अपने परिजन की आइडेंटिटी के साथ खिलवाड़ कैसे कर दें?
हमें शर्म आती है अपने जिले का नाम लेने में!
जब हम अपने परिजनों का नाम नहीं बदल सकते क्योंकि उससे हमारी आईडेंटिटी पर असर पड़ेगा तो हम क्यों जिलों का नाम बदलने की सिफारिश करते हैं? क्या हमने कभी अपनी जन्मभूमि को अपना हिस्सा नहीं माना या हमें शर्म आती है अपने जिले का नाम लेने में! कभी पूछिएगा किसी सुखई या खेमई के बेटा-बेटी से क्या उन्हें अपने पिता के नाम में कोई दिक्कत नजर आती है? क्या वह इसे बदलना चाहते हैं? वह इस बात को सिरे से खारिज करते हुए शायद आपको दो-चार बाते सुना दें.

अक्सर आपको कोई ना कोई यह कहते हुए मिल जाएगा कि लोग बस्ती नाम सुनते ही कोई झुग्गी झोपड़ी समझ लेते हैं. इसलिए नाम बदलना जरूरी है. मुझे सिर्फ एक बात का जवाब दीजिए कि सिर्फ आजादी से ही अगर जोड़ें तो अगर आप 73 साल में किसी जिले का नाम देश भर में नहीं फैला सके वह भी तब जबकि देश के कोन-कोने में आप रहते हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि नया नाम होने के बाद सिवाय चंद दिन खबरों में रहने के आपके जिले का नाम रोशन हो जाएगा? क्या इस बात की गारंटी कोई दे सकता है कि जिन समस्याओं से फिलहाल बस्ती जूझ रही है क्या उन सभी समस्याओं का निदान हो जाएगा? अगर हां तो 20 बार नाम बदल दीजिए लेकिन अगर आप कोई गारंटी नहीं दे सकते तो इलेक्टेड नेताओं और सेलेक्टेड अफसरों को इसका कोई अधिकार नहीं है कि वह किसी जिले के इतिहास से छेड़छाड़ करें.
जिन जिलों के नाम बदले गये क्या उनके पुराने नाम खत्म हो गये?
जो आज सांसद हैं, विधायक है या आज जिले के कमिश्नर और डीएम हैं क्या उन्हें इस बात का इल्म भी है कि उनके बगल के ही दो जिलों के नाम बदल दिये गए थे लेकिन आज भी लोग पुराने नाम से ही याद रखते हैं. नौगढ़, बांसी और डुमरियागंज को लोग सिद्धार्थनगर नहीं बुलाते. पुराना नाम लोगों की जुबां पर चढ़ा हुआ है. खलीलाबाद को लाख आपने संतकबीरनगर कह दिया लेकिन गोरखपुर से गोंडा जाने वाली सवारी गाड़ी वाया खलीलाबाद होकर ही जाती है. ज्यादा दूर क्यों जाना गांधी नगर स्थित तुरकहिया का नाम बदलकर शिवनगर किया गया लेकिन आज भी लोग तुरकहिया ज्यादा याद रखते हैं. ज्यादा हुआ तो शिवनगर तुरकहिया बोल दिया. आखिर नाम बदल कर हासिल क्या हुआ?
राजस्व बोर्ड को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि नाम बदलने में 1 करोड़ रुपए खर्च होंगे. 1 करोड़ किसी सरकार के लिए बड़ी रकम नहीं हैं. लेकिन क्या यह रकम सिर्फ जिले का नाम बदलने के लिए ही खर्च किया जाये. आखिर कभी किसी ने जिले के बीचोबीच स्थित अंबिका प्रताप नारायण पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कॉलेज की हालत ठीक करने की बात क्यों नहीं की? कभी किसी ने किसान डिग्री कॉलेज की हालत का जिक्र क्यों नहीं किया? क्यों नहीं किसी ने कभी इस बात का जिक्र किया शहर की सीमा पार होते ही सड़क टूट चुकी है. अगर मजबूरी ना हो तो सरकारी बस, मुंडेरवा हो कर नहीं जाती. तस्वीर जहन में याद हो तो आपको पता होगा कभी नेता लोग क्षय रोग अस्पताल के पास सड़के गड्ढे में धान की रोपाई करते थे.

अच्छा यह सब छोड़िए, आपको लगेगा कि मैं काफी नकारात्मक बात लिख रहा हूं. जिले में शहरी सीमा के भीतर नई बस्ती और पुरानी बस्ती है तो क्या वशिष्ठी या वशिष्ठनगर में नई बस्ती, नई वशिष्ठी हो जाएगा या पुरानी बस्ती को लोग पुरानी वशिष्ठी कहने लगेंगे? बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र की करें तो यहां तीन बाजार ऐसे हैं जिन्हें लोग दो-दो नामों से जानते हैं. पहला उर्दू बाजार जिसे हिन्दी बाजार भी कहा जाता है. अली नगर, जिसे आर्यनगर भी कहा जाता है. मियां बाजार को माया बाजार भी कहा जाता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इस आशय का दावा किया जाता है कि जब साल 1998 में योगी आदित्यनाथ पहली बार सांसद बने तो इन तीन नामों को बदला गया था.
यह भी पढ़ें: रंग लाई विधायक संजय प्रताप जायसवाल की पहल, होगा रूधौली-भानपुर सड़क का चौड़ीकरण
क्या वशिष्ठनगर या वशिष्ठी होने से खत्म हो जाएंगी बस्ती की समस्याएं?
अब कोई इस बात की भी जानकारी दे कि क्या भारतेंदु हरिश्चंद्र को साल 2020 में वापस लौट कर आना पड़ेगा और फिर उन्हें बस्ती को बस्ती कहूं तो काको कहूं उजाड़, को संपादित कर वशिष्ठी को वशिष्ठी कहूं तो काको कहूं उजाड़ करना पड़ेगा? सवाल यह नहीं है कि आप नाम बदल रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर इस नाम के साथ क्या बदलेगा? अगर आप आजादी के 73 साल बाद बस्ती को सम्मान नहीं दिला सके? बस्ती के सांसद रहे केशव देव मालवीय के प्लास्टिक कॉम्पलेक्स को नहीं बचा पा रहे हैं. जिले में प्राथमिक शिक्षकों की समस्याओं को दूर नहीं कर पा रहे हैं. शिक्षा का स्तर नहीं सुधार पा रहे हैं तो किस मुंह से नाम बदलने की ओर आगे बढ़ रहे है?
बस्ती की चीनी मिल की हालत किसी से छिपी नहीं है. पूर्व रेल मंत्री और फिलहाल रांची की एक जेल में सजा काट रहे लालू प्रसाद यादव के रेल बजट में स्मार्ट स्टेशन का दर्जा पाने वाला बस्ती रेलवे स्टेशन अभी तक विकास की बाट जोह रहा है. जो शहर और उसका प्रशासन अपने महोत्सव में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सरीखी हस्तियों भुला बैठे वह कैसे दावा कर सकता है कि नाम बदलने से हालात बदल जाएंगे?
मजे की बात देखिए जिले की वेबसाइट का क्या हाल है!
मजे की बात देखिये जिस जिले की वेबसाइट का इतिहास वीकिपीडिया से कॉपी किया गया जिसके दावों पर यकीन मुश्किल है और जिसे कोई भी लॉग इन कर अपडेट कर सकता है. जिलाधिकारी बदले हुए पांच महीने से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन कॉन्टैक्ट अस में अभी भी जिलाधिकारी के तौर पर पूर्व डीएम माला श्रीवास्तव का नाम दिख रहा है और वेबसाइट के होम पेज पर मौजूदा डीएम की तस्वीर लगी हुई है. अक्टूबर में ही यूपी सरकार ने यूपी पुलिस का डायल नंबर 100 की जगह 112 कर दिया लेकिन बस्ती एनआईसी पर अभी तक 100 नंबर की ही जानकारी दी जा रही है.
हकीकत की जमीन का भी ख्याल करें
अब आप तय करिए कि कैसे कोई अफसर या नेता यह तय कर सकता है कि आपके जिले का नाम क्या था और क्या होना चाहिए. हो सकता है कि नाम बदलने जाने के निर्णय से आप खुश हों लेकिन यह भी जरूर देखें कि आखिर इसका आपकी जिन्दगी पर क्या असर पड़ेगा. क्या जिले का नाम बदलने से शिक्षा प्रणाली सुधर जाएगी? क्या खटारा बसों का शिकार बस्ती डिपो एकदम चकाचक हो जाएगा? क्या सड़कें एकदम रवां हो जाएंगी और क्या आपकी प्रतिदिन की आय बढ़ जाएगी? वेबसाइट पर छोटी से छोटी चीजें जो अपडेट की जा सकती हैं वह पांच महीने में नहीं हो सकीं और कैसे कोई एकाएक आपके जिले का नाम बदल सकता है?


आप चाहें तो कह सकते हैं कि सारी समस्याएं अब क्यों याद की जा रही हैं? दरअसल, यह सारी समस्याएं पहले भी थीं. अब भी हैं. और यह तब तक रहेंगी जब तक हम और आप जागरुक नहीं होंगे. जिले का नाम बदलने में जो 1 करोड़ खर्च किये जाने की संभावना है, उनका बहुत छोटा सा हिस्सा इन कामों में लगाया जाता तो शायद यह लिखना नहीं होता. जरूरी नहीं है कि इस लेख में बहुत सारी बातें शामिल हो गई हों लेकिन यह जरूर ध्यान रखें कि जो भी छूट रहा वह आपको जरूर याद आए.
बेहतर हो कि जिला प्रशासन पहले समस्याओं से अवगत हो. नेता जनदबाव में काम जरूर करें लेकिन हकीकत की जमीन का भी ख्याल करें. शहर का नाम बदलने से पहले हालात बदलिए, यही हमारे भविष्य के लिए हितकर होगा. आखिर में एक सवाल के साथ आप सभी को छोड़े जाता हूं कि आखिर क्यों जरूरी है बस्ती का नाम बदल कर वशिष्ठ नगर कर देना?(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
आप हमसे यहां भी जुड़ सकते हैं.
अन्य खबरों के लिए क्लिक करें– https://bhartiyabastiportal.com/ पर.
Website – https://bhartiyabasti.com
Facebook – https://www.facebook.com/bhartiyabastidainik
Twitter – https://twitter.com/bhartiyabasti
YouTube –Bhartiya Basti
यह भी पढ़ें: बस्ती में होता था नकली नोट बनाने का काम! पुलिस ने किया खुलासा
ताजा खबरें
About The Author
भारतीय बस्ती, बस्ती और अयोध्या से प्रकाशित होने वाला प्रमुख समाचार पत्र है. इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग भारतीय बस्ती के संवाददाताओं द्वारा ज़मीनी स्तर पर की गई है