भारतीयों के मन में नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा

भारतीयों के मन में नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा
ramlalla

-राजेश माहेश्वरी
अयोध्या में राम मंदिर में राम लला की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही लगभग 500 साल लंबी प्रतीक्षा खत्म हो गई. देष ही नहीं दुनिया के तमाम देषों में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा का आनंद हवाओं में तैरता और गूंजता सुनाई दिया. राम मंदिर को लेकर बहुत लंबा आंदोलन चला है और संघर्ष किया गया है. उसमें आरएसएस, विहिप और भाजपा के नेता और कार्यकर्ता ही शामिल थे. असंख्य लोगों ने बलिदान भी दिए. संविधान पीठ के निर्णय से राम मंदिर का निर्माण संभव हो पाया. प्राण-प्रतिष्ठा के दिन अयोध्या का वैभव शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है. दिन हो या रात, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि अयोध्या सोएगी. हर ओर उत्साह, उमंग व भक्ति की लालिमा छाई हुई थी.  लोग एक-दूसरे को मिठाई बांट रहे थे.  जहां दृष्टि जाए, वहां सिर्फ श्रीराम की छवि या उनका नाम ही नजर आ रहा था.

देष ही नहीं दुनियाभर में इस कार्यक्रम की धूम रही. करीब 55 देशों में प्रभु राम की मान्यता है. आज भी अमरीका के करीब 1100 मंदिरों में ‘रामोत्सव’ मनाया जा रहा है. उसके भौतिकतावादी शहर भी ‘राममय’ हैं और आपस में ‘जय सियाराम’ के उद्घोष के साथ एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं. ब्रिटेन के 500 मंदिरों में ‘श्रीराम विजयोत्सव’ मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी मंदिर जाकर ‘रामायण का पाठ’ सुन सकते हैं. नीदरलैंड्स सरीखे देश में ‘राम मंदिर के चित्र’ वाले डाक टिकट जारी किए गए हैं. यूरोप के कई देश भी ‘राममय’ हैं. इसका स्पष्ट निष्कर्ष है कि इतने व्यापक हैं श्रीराम! भारत की प्रत्येक दिशा में राम आराध्य हैं और 350 से अधिक ‘रामायण’ सृजित की गई हैं. राम के लिए जितना महत्त्व अयोध्या का है, उतना ही ‘रामेश्वरम’ का है. यह इस बात का प्रमाण है कि श्री राम की स्वीकार्यता पूरे विश्व में है.

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राम मंदिर और राम लला की प्राण प्रतिष्ठा तक इस मामले में राजनीति कम नहीं हुई. प्राण-प्रतिष्ठा का कांग्रेस समेत कई दलों ने बहिष्कार किया. कांग्रेस का तर्क था कि प्राण-प्रतिष्ठा आरएसएस और बीजेपी का कार्यक्रम है. राम जन्म भूमि की मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्षों तक चला संघर्ष जब अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा तो फिर विधर्मी दासता के प्रतीक ढांचे को धूल धूसरित होते देर न लगी. वह इस बात का प्रतीक था कि रावण की अभेद्य लंका को भी राम भक्ति की साधारण कही जाने वाली शक्ति छिन्न—भिन्न करने में सक्षम है. 6 दिसंबर 1992 की वह घटना इतिहास के नए अध्याय की शुरुआत थी किंतु उसके पूर्व जिन पूज्य साधु-संतों और ज्ञात-अज्ञात कारसेवकों ने राम काज के लिए अपना बलिदान दिया उनकी पवित्र आत्माएं इस संघर्ष को प्रेरणा और प्रोत्साहन देती रहीं. राम मंदिर के लिए चली लंबी संघर्ष यात्रा का यह पल निश्चित रूप से अविस्मरणीय है. अयोध्या को उसकी प्राचीन भव्यता मिलने के साथ ही आज देश को अपनी दिव्यता का जो अनुभव हुआ वह सही मायने में सनातन परंपरा से जुड़े करोड़ों भारतीयों के मन में नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा है.

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प्राण-प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजन को रोकने और धर्म विरोधी साबित करने के लिए जो कुछ भी किया गया वह जितना हास्यास्पद है, उतना ही दुखद भी है. लेकिन ये परम संतोष का विषय है कि देश के जनमानस ने आधुनिक मंथराओं को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया है. यहां तक कि कतिपय धर्माचार्यों की आपत्तियों का संज्ञान भी नहीं लिया जा रहा. यह बात भी बेहद उत्साहवर्धक है कि देश भर में फैले लाखों सनातनी धर्मगुरु, पंडित, पुरोहित और कथावाचक पूरे प्राण-प्रण से 22 जनवरी के आयोजन को भव्य और अविस्मरणीय बनाने में जुटे थे. देश का प्रत्येक कोना इन दिनों राम मय हो गया है. इतना बड़ा चमत्कार दैवीय कृपा से ही हो सकता है. ऐसे में जो लोग प्राण-प्रतिष्ठा के आयोजन को विफल करना चाह रहे थे वे भारतीय जनमानस को पढ़ने में बुरी तरह विफल हैं. उनके इसी आचरण की वजह से वे जनता की निगाह से उतरते चले गए और बची खुची कसर आगामी लोकसभा चुनाव में पूरी हो जाएगी.

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कांग्रेस और गैर कांग्रेसी विपक्षी दल भी यदि कमजोर होते जा रहे हैं तो उसकी वजह मुख्य धारा से अलग बहने की उनकी नीति है. आरएसएस, वीएचपी और भाजपा बीते कई दशक से अपना जनाधार बढ़ाने में जुटे हुए हैं. राम मंदिर पर सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार किए बिना ही अयोध्या में कारसेवकपुरम नामक स्थान पर पत्थरों की गढ़ाई का काम निरंतर चलता रहा. उसी का परिणाम है कि फैसला आने के बाद इतनी जल्दी मंदिर निर्माण संभव हो सका. दूसरी तरफ सर्वाेच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद भी भाजपा विरोधी मंदिर निर्माण का श्रेय उससे छीनने में जुटे रहकर अपनी समूची शक्ति व्यर्थ गंवाते रहे. यही कारण है कि आज जब पूरे देश में राम नाम का उद्घोष हो रहा है और पूरी दुनिया में फैले करोड़ों सनातनी 22 जनवरी को लेकर उत्साहित मना रहे थे तब समूचा विपक्ष कुंठाग्रस्त होकर बैठा हुआ था. इसे लेकर उसके भीतर भी विरोध फूटने लगा है जिसका देर-सवेर खुलकर बाहर आना तय है. अयोध्या में प्रभु राम का प्राण-प्रतिष्ठा समारोह विशुद्ध रूप से ‘धार्मिक’ है. राम मंदिर से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है, लेकिन इस समारोह से भाजपा को ‘राजनीतिक लाभ’ होना निश्चित है. धार्मिक और राजनीतिक के अंतर को समझना अनिवार्य है. एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक आयोजन को ‘राजनीतिक’ करार देना अपरिपक्वता है. महज कोसते रहने से कांग्रेस को कुछ भी हासिल नहीं होगा.

राम का व्यक्तित्व, लोकतंत्र, लोकमंगल और आदर्श राज्य-व्यवस्था की अभिव्यक्ति है. उनका कृतित्व लोकतांत्रिक मूल्यों की आधारशिला है. उन्होंने ‘रामराज्य’ नाम की जिस वैचारिकी का सूत्रपात किया. दुनिया के लगभग सभी लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य वही है. लोकतंत्र के सारे सूत्र इसी रामराज्य से निकलते हैं. आखिर ये राम हैं कौन? जिनका नाम लेकर एक वृद्ध गांधी अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ गया. जिसके नाम पर इस देश में आदर्श शासन की कल्पना की गई. उसी ‘रामराज्य’ के सपने को देख देश आजाद हुआ. गांधी ने अपने सपने को ‘सुराज’ कहा. विनोबा इसे ‘प्रेम योग’ और ‘साम्य योग’ के तौर पर देखते थे.

महात्मा गांधी ने ‘राम राज्य’, ‘हिंद स्वराज’ को व्यापक स्तर पर परिभाषित किया था, लेकिन वह भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के खिलाफ थे. उनके दर्शन, उनकी आस्था और उनके राष्ट्रवाद को भारत ने गहराई से समझा और स्वीकार किया, नतीजतन वह ‘महात्मा’ बन पाए. गांधी जी ने भी रामराज्य का सपना देखा था. ऐसा रामराज्य जिसमें पारदर्शिता के साथ वास्तविक सुशासन हो. एक आदर्श सुशासन की व्यवस्था ही उनके लिये सच्चा लोकतंत्र था. जिसमें राजा और रंक के समान अधिकार हों. उनकी दृष्टि में रामराज्य ममता समता का शासन था. सत्य और धर्म उसका आधार था. यद्यपि उनकी दृष्टि में राम-रहीम में कोई भेद नहीं था. बहरहाल, अब जब सदियों के विवाद का पटाक्षेप करके अयोध्या में राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्य विधिवत संपन्न हो गया है तो देश का ध्यान हमारे सामने मौजूद अन्य विकट चुनौतियों पर हो.

राम शुभ हैं, राम मंगल हैं, राम प्रेरणा हैं, विश्वास हैं. वे धर्म की मूर्ति नहीं विग्रह हैं, स्वयं धर्म हैं. जीवन का मर्म हैं, आदि और अंत हैं. राम फिर लौटे हैं, त्रेता युग में राम अयोध्या में लौटे, अब मंदिर में लौट रहे हैं, राम अब अपने हृदय में भी लौटें. अपने हृदय में, अपने समाज में, अपने परिवार में, अपने जीवन के हर आयाम में रामत्व, राम तत्व लौटे. और भारत के लिए, मानवता के लिए कल्याणकारी राममय जीवन गढ़ें.

-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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