Press Club Basti 2025 Election: बस्ती प्रेस क्लब में चुनाव हो रहा है तो होते हुए दिखे भी!
Press Club Basti Election 2025

उत्तर प्रदेश स्थित बस्ती में प्रेस क्लब के चुनाव का परिणाम क्या होगा यह तो 16 सिंतबर को पता चलेगा लेकिन मौजूदा स्थिति में आरोप-प्रत्यारोप और कहासुनी के बीच राहत इंदौरी का एक शेर याद आ रहा है- नए किरदार आते जा रहे हैं मगर नाटक पुराना चल रहा है.
हालांकि राहत इंदौरी का यह शेर चुनाव के प्रत्याशियों के संदर्भ में बात करें तो सिर्फ अधूरा ही फिट बैठ रहा है. फिलहाल तो किरदार भी नए नहीं हैं. दावा है कि जो नए किरदार समय की रोशनी में से अपना वास्ता कराने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें येन-केन-प्रकारेण मंच पर जगह ही नहीं दी जा रही है.
हर ओर इसी बात का शोर है कि जिस जिले में तमाम पत्रकार हों, वहां सिर्फ 142 लोग ही पत्रकारिता के भाग्यविधाता कैसे हो सकते हैं? वो कौन हैं जो यह तय कर रहें हैं कि कौन मेंबर बन सकता है और कौन नहीं?
सिर्फ लोकतांत्रिक दिखने का नाटक भर!
कुछ लोग तो दबी जुबां से यह भी कह रहे हैं कि यह सिर्फ लोकतांत्रिक दिखने का नाटक भर है. प्रेस क्लब में चुनाव के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी हो रही है. कोई कह रहा है नाम काट दिया तो किसी का दावा है नाम जोड़ा ही नहीं.
इस प्रेस क्लब के चुनाव में यह तय हो जाएगा कि क्या बस्ती की पत्रकारिता सिर्फ इन 142 लोगों की गुलाम बन कर रह जाएगी या वास्तव में जिस स्वतंत्रता की बात होती है, वैसा कुछ वास्तव में हो रहा है.
कोर्ट कचहरी के मामलों को लेकर कहा जाता है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए. कुछ ऐसा ही बस्ती के प्रेस क्लब के चुनाव में भी हो तो कितना अच्छा हो कि चुनाव केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना चाहिए.
इतने सवाल तो लिखित शिकायत क्यों नहीं?
दावा किया जा रहा है कि मौजूदा पदाधिकारियों (जो इस चुनाव में प्रत्याशी भी हैं) उनमें से कुछ ने चुनाव मतदाता सूची में संशोधन के नाम जो खिलवाड़ किया है उसमें सिर्फ चुनाव हो रहा है, होता हुआ दिख नहीं रहा है.
यहां यह भी समझ के परे है कि लोग इतने सारे आरोप लोग लगा रहे हैं. सोशल मीडिया से लेकर मुंहजुबानी तक लेकिन कोई भी एक अदद लिखित शिकायत लेकर प्रेस क्लब के चुनाव अधिकारी तक नहीं पहुंचा! ऐसे में सिर्फ एक पक्ष को देखकर निर्णय करना भी गलत है. हालांकि अब इन आरोपों पर प्रेस क्लब और उसके मौजूदा पदाधिकारियों की अधिकृत चुप्पी (किसी मीडिया संस्थान को दिए बयान का मतलब वैसा ही है जैसे किसी मुद्दे पर नेता विधानसभा या संसद में बोलने के बजाय दूरी बना ले. असली रिकॉर्ड तो विधानसभा और संसद ही है. मीडिया संस्थान में दिए बयान रिकॉर्ड माने जाएं, इसकी उम्मीद बहुत कम है.) इस आशय के संकेत दे रही है कि कहीं न कहीं इन दावों में सच्चाई तो है अन्यथा धुआं कैसे उठता?
प्रेस क्लब को चाहिए कि जो आरोप लग रहे हैं, उन पर जवाब दें और जो आरोप लगा रहे हैं कि उनकी भी जिम्मेदारी है कि वह भी जुबानी जमाखर्च न करें, अधिकृत कदम उठाएं जो बस्ती के प्रेस क्लब और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने वाला हो.
भारतीय बस्ती की ओर से प्रेस क्लब बस्ती चुनाव 2025 में सभी प्रत्याशियों को शुभकामनाएं. कोई भी जीते या हारे लेकिन प्रेस क्लब की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की विजय अवश्य होनी चाहिए. (लेखक bhartiyabasti.com के संपादक हैं.)
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वागार्थ सांकृत्यायन
संपादक, भारतीय बस्ती
वागार्थ सांकृत्यायन एक प्रतिबद्ध और जमीनी सरोकारों से जुड़े पत्रकार हैं, जो पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। भारतीय बस्ती के संपादक के रूप में वे खबरों को सिर्फ़ घटनाओं की सूचना तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनके सामाजिक और मानवीय पक्ष को भी उजागर करते हैं।
उन्होंने भारतीय बस्ती को एक मिशन के रूप में विकसित किया है—जिसका उद्देश्य है गांव, कस्बे और छोटे शहरों की अनसुनी आवाज़ों को मुख्यधारा की मीडिया तक पहुंचाना। उत्तर प्रदेश की राजनीति, समाज और संस्कृति पर उनकी विशेष पकड़ है, जो खबरों को गहराई और विश्वसनीयता प्रदान करती है