लॉकडाउन में मिली छूट, बिगड़ने लगी कुआनों की हालत
बस्ती (भाब). उत्तर प्रदेश स्थित बस्ती में जीवन दायनी कुआनों (Kuano River Basti) लॉकडाउन शुरू होने के प्रथम चरण में साफ तो हुई लेकिन लगातार मिलती छूट के साथ ही कुआनों अपने पुराने स्वरूप में आ चुकी है. नदी के घाट पर पसरी गंदगी, प्लास्टिक बोतल, बीयर केन, जल कुम्भी शैवाल, प्लास्टिक बोरों में भर कर फेंका गया कचरा पानी में सड़ाध पैदा कर रहा है. वहीं नदी में गंदगी फैलाने की रही सही कसर कुआनों के प्रति श्रद्धा रखने वालो ने शादी कार्ड, कैलेन्डर, पूजन सामग्री के अवशेष डालकर पूरी कर दी.
लॉकडाउन (Lockdown In Basti) के 21 दिन में कुआनों का पानी साफ हुआ, वह स्वच्छ, निर्मल हुई तो लगा अब इसके भी दिन बहुरेंगे. लेकिन दूसरे चरण में मिली छूट के साथ जब लोगों का घरों से निकलना शुरू हुआ तो पहले श्रद्धा स्वरूप पूजा सामग्री के अवशेष, पुराने शादी कार्ड, कैलेन्डर आदि डालकर लोगो ने कुआनों की स्वच्छता में बट्टा लगाना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं देर शाम तक घाट पर शराब के शौकीनों का कब्जा हो जाता है और सिगरेट के छल्लों के बीच शराब के नशे में धुत शौकीन नमकीन के पालीथीन, पानी और बीयर शराब की खाली बोतलों को कुआनों में प्रवाहित कर मस्त होकर चल देते है.
कोरोना वायरस के के बीच कुआनो के स्वच्छ निर्मल होने से जहां प्रकृति मुस्करा रही थी वहीं अब मिली छूट के बीच उसका स्वच्छ निर्मल जल फिर से गंदला होने लगा है. जलकुम्भी और शैवाल फिर एक बार नदी के दोनो किनारो को ढ़कता चला जा रहा है. कुआनों को लेकर चिंता व्यक्त करने और उसे स्वच्छ निर्मल बनाने के लिए साफ सफाई करते फोटो डाल कर वाहवाही लूटने वाले संगठन भी ना जाने कहा गुम हो गये हैं.
जिला प्रशासन तक सिमट कर रह गए कुआनों की आरती करने वाले
साल भर में एक बार कुआनों आरती के आयोजन के बाद केवल प्रशासन के इर्द गिर्द घूमने वाले संगठन भी जिला प्रशासन तक ही सिमट कर रह गये है. समाज सेवियों के साथ ही कुआनों में जल सत्याग्रह कर अपनी राजनीति चमकाने वाले राजनेताओ को अब शायद ही कुआनो याद आयें. कुंआनों को लेकर राजनीतिक मंचो पर भाषण लगातार हुये. नदियों को प्रदूषण से मुक्त बनाये रखने के लिए कार्यरत प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नदियो के बिगड़ते हालात पर केवल चिन्ता व्यक्त करने और क्लीन चिट देकर छोटी मोटी धनराशि का जुर्माना लगाकर अपने कर्तव्यों को पूरा करने में लगा है.
लॉकडाउन में आम जन से दूर हुई कुआनों ने कुछ दिन खुलकर सांस लेना शुरू ही किया था कि आम जन के उसके करीब आते ही वह पुनः अपने विद्रूप रूप को देखकर घुटन महसूस कर रही है. हालत यह है कि सरकार अर्थव्यवस्था और कोराना से लड रही है लेकिन आम जन अपनी प्रकृति के प्रति क्रूरता से बाज नही आ रहा है. पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि हम नहीं चेते और सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो हमे प्रकृति के अनजाने क्रोध को भी भुगतने के लिए तैयार रहना होगा.
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