बस्ती में साँस लेना भी खतरनाक! AQI 136 पार, जानिए किन फैक्ट्रियों से हो रहा नुकसान

WHO की सीमा से 10 गुना ज़्यादा प्रदूषण- रिपोर्ट

बस्ती में साँस लेना भी खतरनाक! AQI 136 पार, जानिए किन फैक्ट्रियों से हो रहा नुकसान
बस्ती में साँस लेना भी खतरनाक! AQI 136 पार, जानिए किन फैक्ट्रियों से हो रहा नुकसान

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक तरफ खेतों की हरियाली है, तो दूसरी तरफ चिमनियों का धुआँ. बस्ती जिले में दर्जनों छोटे-बड़े उद्योग चल रहे हैं जो लाखों लोगों को रोज़गार देते हैं - लेकिन इनसे होने वाला प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या बन चुका है.

जिले में कौन-कौन सी फैक्ट्रियाँ चल रही हैं?

बस्ती की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और कृषि आधारित उद्योगों पर टिकी है. जिले में इस समय 4 बड़ी चीनी मिलें सक्रिय हैं जो गन्ना पेराई के सीज़न में हज़ारों मज़दूरों को काम देती हैं. इसके अलावा जिले में ये उद्योग भी चल रहे हैं:

  • आटा मिल (Govind Mill Ltd., वाल्टरगंज)
  • ईंट-भट्टे — बड़ी संख्या में, खासकर ग्रामीण इलाकों में
  • पीतल और लोहे का सामान बनाने वाली इकाइयाँ
  • कृषि उपकरण निर्माण इकाइयाँ
  • जूते-चप्पल, साबुन, मोमबत्ती और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लघु उद्योग

जिला उद्योग केंद्र (DIC) के अनुसार बस्ती में उद्योगों की संख्या हर साल लगभग 4% की दर से बढ़ रही है - जो विकास की एक सकारात्मक तस्वीर दिखाती है.

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हवा हो रही है जहरीली - AQI 136 तक पहुँचा

IQAir के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक बस्ती का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 136 दर्ज किया गया है. यह संवेदनशील समूहों के लिए अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आता है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बस्ती में PM2.5 का स्तर WHO की वार्षिक गाइडलाइन से 10 गुना अधिक है. यानी जो हवा हम रोज़ साँस में ले रहे हैं, वो दुनिया की स्वास्थ्य संस्था के मानक से 10 गुना ज़्यादा प्रदूषित है.

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चीनी मिलें सबसे बड़ा प्रदूषण का स्रोत

चीनी मिलों और डिस्टिलरी को भारत सरकार ने रेड जोन श्रेणी में रखा है- यानी ये देश के 17 सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में शामिल हैं. हवा का प्रदूषण, गन्ने की पेराई के दौरान मिलों से निकलने वाली राख आसपास के गाँवों में फैलती है. वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों में गीला कचरा जलाने से भारी मात्रा में धुआँ और कालिख निकलती है. नियम कहते हैं राख को नम रखकर बाउंड्री के भीतर डंप किया जाए- लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है.

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 उत्तर प्रदेश की बड़ी चीनी मिलें हर रोज़ 85.7 मिलियन लीटर गंदा अपशिष्ट जल नदी तंत्र में बहा देती हैं. बस्ती की घाघरा, मनोरमा और कुवानो नदियाँ इस कचरे की सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं. भूजल खतरे में: मिलों का जहरीला पानी ज़मीन में रिसकर भूजल को दूषित कर रहा है. कई इलाकों में हैंड पंपों से रंगीन पानी आने की शिकायतें हैं - जाँच में लेड और लोहे का खतरनाक स्तर पाया गया है.

आम लोगों को क्या दिक्कत हो रही है?

साँस की बीमारियाँ बढ़ रही हैं. बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. खाँसी, दमा और फेफड़ों की तकलीफें आम होती जा रही हैं.
पीने का पानी दूषित हो रहा है. कई गाँवों में साफ पानी मिलना मुश्किल हो गया है. खेती पर असर. नदियों का पानी प्रदूषित होने से सिंचाई पर भी असर पड़ रहा है. मछुआरों की आजीविका खतरे में है. घरेलू प्रदूषण भी कम नहीं. जिन घरों में अभी भी लकड़ी, कोयला और गोबर के उपले जलाए जाते हैं- वहाँ महिलाओं और बच्चों को सबसे ज़्यादा नुकसान है.

निगरानी तंत्र कितना कारगर है?

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) हर तीन महीने में सामान्य उद्योगों का और रेड जोन उद्योगों का महीने में एक बार निरीक्षण करता है. लेकिन जानकारों का कहना है कि नियम कागज़ पर ज़्यादा हैं, ज़मीन पर कम. निरीक्षण होता है, नोटिस जारी होते हैं -फिर भी चिमनियाँ धुआँ उगलती रहती हैं.

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों के अनुसार इन कदमों से स्थिति सुधर सकती है:

  •  ETP अनिवार्य करें- हर मिल में Effluent Treatment Plant लगाना ज़रूरी हो और उसकी नियमित जाँच हो.
  • राख प्रबंधन सख्त हो- मिलों को राख को नम रखकर ढककर डंप करना होगा- हवा में उड़ने देना बंद हो.
  • जल की सार्वजनिक जाँच हो- हर तीन महीने में नदी और भूजल की जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.
भारतीय बस्ती
bhartiyabasti.com
29 Jun 2026 By Vagarth Sankrityaayan

बस्ती में साँस लेना भी खतरनाक! AQI 136 पार, जानिए किन फैक्ट्रियों से हो रहा नुकसान

WHO की सीमा से 10 गुना ज़्यादा प्रदूषण- रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक तरफ खेतों की हरियाली है, तो दूसरी तरफ चिमनियों का धुआँ. बस्ती जिले में दर्जनों छोटे-बड़े उद्योग चल रहे हैं जो लाखों लोगों को रोज़गार देते हैं - लेकिन इनसे होने वाला प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या बन चुका है.

जिले में कौन-कौन सी फैक्ट्रियाँ चल रही हैं?

बस्ती की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और कृषि आधारित उद्योगों पर टिकी है. जिले में इस समय 4 बड़ी चीनी मिलें सक्रिय हैं जो गन्ना पेराई के सीज़न में हज़ारों मज़दूरों को काम देती हैं. इसके अलावा जिले में ये उद्योग भी चल रहे हैं:

  • आटा मिल (Govind Mill Ltd., वाल्टरगंज)
  • ईंट-भट्टे — बड़ी संख्या में, खासकर ग्रामीण इलाकों में
  • पीतल और लोहे का सामान बनाने वाली इकाइयाँ
  • कृषि उपकरण निर्माण इकाइयाँ
  • जूते-चप्पल, साबुन, मोमबत्ती और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लघु उद्योग

जिला उद्योग केंद्र (DIC) के अनुसार बस्ती में उद्योगों की संख्या हर साल लगभग 4% की दर से बढ़ रही है - जो विकास की एक सकारात्मक तस्वीर दिखाती है.

हवा हो रही है जहरीली - AQI 136 तक पहुँचा

IQAir के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक बस्ती का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 136 दर्ज किया गया है. यह संवेदनशील समूहों के लिए अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आता है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बस्ती में PM2.5 का स्तर WHO की वार्षिक गाइडलाइन से 10 गुना अधिक है. यानी जो हवा हम रोज़ साँस में ले रहे हैं, वो दुनिया की स्वास्थ्य संस्था के मानक से 10 गुना ज़्यादा प्रदूषित है.

चीनी मिलें सबसे बड़ा प्रदूषण का स्रोत

चीनी मिलों और डिस्टिलरी को भारत सरकार ने रेड जोन श्रेणी में रखा है- यानी ये देश के 17 सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में शामिल हैं. हवा का प्रदूषण, गन्ने की पेराई के दौरान मिलों से निकलने वाली राख आसपास के गाँवों में फैलती है. वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों में गीला कचरा जलाने से भारी मात्रा में धुआँ और कालिख निकलती है. नियम कहते हैं राख को नम रखकर बाउंड्री के भीतर डंप किया जाए- लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है.

 उत्तर प्रदेश की बड़ी चीनी मिलें हर रोज़ 85.7 मिलियन लीटर गंदा अपशिष्ट जल नदी तंत्र में बहा देती हैं. बस्ती की घाघरा, मनोरमा और कुवानो नदियाँ इस कचरे की सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं. भूजल खतरे में: मिलों का जहरीला पानी ज़मीन में रिसकर भूजल को दूषित कर रहा है. कई इलाकों में हैंड पंपों से रंगीन पानी आने की शिकायतें हैं - जाँच में लेड और लोहे का खतरनाक स्तर पाया गया है.

आम लोगों को क्या दिक्कत हो रही है?

साँस की बीमारियाँ बढ़ रही हैं. बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. खाँसी, दमा और फेफड़ों की तकलीफें आम होती जा रही हैं.
पीने का पानी दूषित हो रहा है. कई गाँवों में साफ पानी मिलना मुश्किल हो गया है. खेती पर असर. नदियों का पानी प्रदूषित होने से सिंचाई पर भी असर पड़ रहा है. मछुआरों की आजीविका खतरे में है. घरेलू प्रदूषण भी कम नहीं. जिन घरों में अभी भी लकड़ी, कोयला और गोबर के उपले जलाए जाते हैं- वहाँ महिलाओं और बच्चों को सबसे ज़्यादा नुकसान है.

निगरानी तंत्र कितना कारगर है?

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) हर तीन महीने में सामान्य उद्योगों का और रेड जोन उद्योगों का महीने में एक बार निरीक्षण करता है. लेकिन जानकारों का कहना है कि नियम कागज़ पर ज़्यादा हैं, ज़मीन पर कम. निरीक्षण होता है, नोटिस जारी होते हैं -फिर भी चिमनियाँ धुआँ उगलती रहती हैं.

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों के अनुसार इन कदमों से स्थिति सुधर सकती है:

  •  ETP अनिवार्य करें- हर मिल में Effluent Treatment Plant लगाना ज़रूरी हो और उसकी नियमित जाँच हो.
  • राख प्रबंधन सख्त हो- मिलों को राख को नम रखकर ढककर डंप करना होगा- हवा में उड़ने देना बंद हो.
  • जल की सार्वजनिक जाँच हो- हर तीन महीने में नदी और भूजल की जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.
https://bhartiyabasti.com/basti-news-live-in-hindi/basti-factories-pollution-air-water-problem/article-25754
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