UP: 111 ग्राम पंचायतों ने श्रमदान से बदल दी तमसा नदी की तस्वीर, 89 KM तक सफाई

UP: 111 ग्राम पंचायतों ने श्रमदान से बदल दी तमसा नदी की तस्वीर, 89 KM तक सफाई
UP: 111 ग्राम पंचायतों ने श्रमदान से बदल दी तमसा नदी की तस्वीर, 89 KM तक सफाई

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में स्थित गंगा की सहायक नदियों में शामिल तमसा नदी पिछले कई वर्षों से प्रदूषण, कचरे और अतिक्रमण जैसी परेशानियों से जूझ रही थी. इन कारणों से नदी का प्राकृतिक स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा था और कई स्थानों पर यह केवल एक पतली व प्रदूषित नदी के रूप में रह गई थी.

इसी स्थिति को बदलने के लिए उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में नदी को पुनर्जीवित करने की एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है. नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशासन और स्थानीय लोगों की संयुक्त भागीदारी से तमसा नदी की सफाई और संरक्षण का अभियान चलाया जा रहा है.

इस अभियान की खासियत यह है कि इसमें भारी मशीनों के बजाय लोगों की सहायता को प्राथमिकता दी गई है. स्थानीय ग्रामीणों, स्कूली बच्चों, महिला स्वयं सहायता समूहों, मनरेगा श्रमिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने श्रमदान कर नदी की सफाई और उसके किनारों के सुधार में सक्रिय भूमिका निभाई है.

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89 किलोमीटर क्षेत्र में चल रहा सफाई अभियान

सरकारी आंकड़ों के अनुसार आज़मगढ़ जिले में लगभग 89 किलोमीटर लंबे नदी क्षेत्र में सफाई और सुधार का काम किया जा रहा है. इस अभियान में 100 से अधिक ग्राम पंचायतों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है.

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नदी के उथले हिस्सों में जमी गंदगी को हटाने, नदी तटों से कचरा साफ करने और अवैध अतिक्रमण को चिन्हित करने जैसे कार्य प्राथमिकता के आधार पर किए जा रहे हैं. इसके साथ ही नदी के किनारों को पर्यावरणीय दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए पेड़ पौधे लगाने का अभियान भी चलाया जा रहा है.

नदी किनारे लगाए जा रहे फलदार पौधे

नदी संरक्षण के इस अभियान में वृक्षारोपण को भी विशेष महत्व दिया गया है. नदी के किनारों पर बड़ी संख्या में फलदार पौधे लगाए जा रहे हैं, जिससे भविष्य में यह क्षेत्र हरित पट्टी के रूप में विकसित हो सके. प्रशासन का मानना है कि इन पेड़ों से भविष्य में मिलने वाले फलों का उपयोग स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम पंचायतों द्वारा किया जा सकेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

दो अलग-अलग तमसा नदियों को लेकर होता है भ्रम

भारत में तमसा नाम से दो नदियां प्रचलित हैं, जिसके कारण कई बार लोग इनके बारे में भ्रमित हो जाते हैं. एक तमसा नदी को टोंस नदी भी कहा जाता है, जिसका उद्गम मध्य प्रदेश के मैहर जिले में कैमूर पर्वतमाला के तमसा कुंड से माना जाता है.

यह नदी आगे चलकर उत्तर प्रदेश के कई जिलों से गुजरती हुई प्रयागराज के पास गंगा नदी में मिल जाती है. इसकी कुल लंबाई 265 किलोमीटर बताई जाती है.

वहीं दूसरी तमसा नदी, जिसके जीर्णोद्धार का अभियान चल रहा है, उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर क्षेत्र से निकलती है और मऊ होते हुए आगे बढ़ती है. इसे कई जगह छोटी सरयू के नाम से भी जाना जाता है.

गर्मियों में कम हो जाती है नदी की धारा

लेकिन तमसा नदी को सामान्य रूप से बारहमासी माना जाता है, लेकिन गर्मियों के दौरान इसका जलस्तर काफी कम हो जाता है. कई जगहों पर नदी केवल संकरी धारा के रूप में दिखाई देती है.

इसके विपरीत मानसून के मौसम में वर्षा के कारण नदी में जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है और कई बार आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति भी बन जाती है. वर्ष 2005 में इसी नदी में आई बाढ़ ने आसपास के क्षेत्रों को काफी प्रभावित किया था.

पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व भी

तमसा नदी का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी काफी पुराना माना जाता है. रामायण के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने पहली रात्रि इसी नदी के तट पर बिताई थी. वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में तमसा नदी का उल्लेख मिलता है, जहां भगवान राम अपने वनवास की शुरुआत के दौरान इस नदी के किनारे ठहरे थे.

महाकवि कालिदास ने भी अपने ग्रंथ रघुवंश में तमसा नदी का वर्णन किया है. माना जाता है कि इसी नदी के तट पर महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंच पक्षी की मृत्यु से व्यथित होकर पहला संस्कृत श्लोक रचा था, जिससे आगे चलकर रामायण की रचना का मार्ग प्रशस्त हुआ.

सफाई से पहले काफी खराब हो चुकी थी स्थिति

अभियान शुरू होने से पहले तमसा नदी की स्थिति काफी चिंताजनक हो चुकी थी. नदी में जलकुंभी, प्लास्टिक कचरा और गाद के कारण जल प्रवाह बाधित हो गया था. कई स्थानों पर पानी काला और बदबूदार हो चुका था, जिससे आसपास के लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था.

जागरूकता अभियान से जुड़े लोग

नदी को स्वच्छ बनाने के लिए प्रशासन की ओर से व्यापक जागरूकता अभियान भी चलाया गया. स्कूलों, ग्राम पंचायतों और स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से लोगों को नदी संरक्षण के महत्व के बारे में बताया गया.

इससे बड़ी संख्या में स्थानीय लोग स्वेच्छा से श्रमदान के लिए आगे आए और नदी के किनारों से प्लास्टिक, पॉलीथीन और अन्य ठोस कचरे को हटाने में योगदान दिया. 

यह ध्यान देने योग्य है कि इससे आसपास के कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की सिंचाई करने में सहायता मिलने की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे किसानों को अच्छा उत्पादन मिल सकता है.

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शोभित पांडेय एक समर्पित और अनुभवशील पत्रकार हैं, जो बीते वर्षों से डिजिटल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। खबरों की समझ, तथ्यों की सटीक जांच और प्रभावशाली प्रेज़ेंटेशन उनकी विशेष पहचान है। उन्होंने न्यूज़ राइटिंग, वीडियो स्क्रिप्टिंग और एडिटिंग में खुद को दक्ष साबित किया है। ग्रामीण मुद्दों से लेकर राज्य स्तरीय घटनाओं तक, हर खबर को ज़मीनी नजरिए से देखने और उसे निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करने में उनकी विशेष रुचि और क्षमता है।