इस गांव में मजबूरी बनी मजहब: हजारों लोगों का हो चुका है धर्म परिवर्तन
इन इलाकों में रहने वाले सिख परिवारों का आरोप है कि उन्हें जबरदस्ती या लालच देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस साजिश में बाहरी लोग भी शामिल हैं, खासकर नेपाल से आए कुछ पादरियों पर संदेह जताया जा रहा है जो प्रोस्टेंट चर्च से जुड़े हुए बताए जाते हैं। पीड़ितों का दावा है कि ये लोग अब गांव में ही बस गए हैं और स्थानीय लोगों को धीरे-धीरे धर्मांतरण की ओर धकेल रहे हैं।
एक महिला ने बताया कि उनके पति को पहले ही ईसाई बना दिया गया और अब उन्हें भी लगातार दबाव दिया जा रहा है कि वे धर्म बदलें। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो उनके खेत जोत दिए गए, फसल नष्ट कर दी गई, बच्चों से मारपीट की गई, और घर में नुकसान पहुँचाया गया। उन्हें लालच भी दिया गया—सरकारी योजनाओं के नाम पर पैसे देने का झांसा, लेकिन हकीकत में उन्हें कुछ नहीं मिला।
इस मामले में पुलिस ने आठ नामजद और चार अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या सिर्फ एक मुकदमा इस पूरे जटिल षड्यंत्र को रोकने के लिए काफी है?
प्रदेश अध्यक्ष हरपाल सिंह जग्गी ने दावा किया कि 2020 से अब तक करीब 3,000 सिख परिवार ईसाई धर्म अपना चुके हैं। इनमें से कई लोग अब भी अपने नाम के आगे "सिंह" लगाए हुए हैं, यानी एक दोहरी पहचान के साथ जी रहे हैं—शायद डर से, मजबूरी से या फिर सामाजिक भ्रम में।
इस पूरे मुद्दे की जड़ में गरीबी, अशिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की कमी भी बड़ी भूमिका निभा रही है। जब गांवों में न शिक्षा है, न स्वास्थ्य सेवाएं, न रोज़गार—तो लोग आसानी से किसी भी झांसे में आ जाते हैं। जब कोई कहता है कि वह भूत-प्रेत भगाएगा, बीमारी ठीक करेगा, और मुफ्त राशन देगा, तो वह भूख और अंधविश्वास से लड़ रहे लोगों के लिए 'उम्मीद' बन जाता है—even if it's fake.
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक पहचान पर हो रहे इस तरह के सुनियोजित हमले को केवल कानून के सहारे नहीं रोका जा सकता। इसके लिए सामाजिक चेतना, प्रशासनिक सक्रियता और ठोस नीति की आवश्यकता है।
वरना यह सिलसिला चलता रहेगा, और लोग धीरे-धीरे अपनी असली पहचान खोते रहेंगे—बिना शोर, बिना विरोध, बस एक खामोश मजबूरी के साथ।