OPINION: ‘ईमानदारी’ के लिए बने कानून से कब तक ‘बेईमानी’ करते रहेंगे निर्भया के दोषी?
व्याकुल भारत
निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Case) मामले में फांसी फिर टाल दी गई है. अंग्रेजी के पांच शब्दों में एक बात कही गई है कि justice delayed is justice denied यानी देर दिया गया न्याय, न्याय नहीं है. इस मामले के दोषी मुकेश, विनय, पवन और अक्षय आये दिन कोई ना कोई नई याचिका लगा दे रहे हैं. कहने को तो यह उनके कानूनी अधिकार हैं लेकिन क्या यह सच नहीं है कि इस मामले ने पूरी तरह से यह बात खोल कर रख दी है कि जिस ईमानदारी के लिए कानून को इतना लचीला बनाया गया कि आखिरी वक्त तक व्यक्ति अपने न्याय के लिए लड़ सके, अब उसी के साथ बेईमानी हो रही है?
ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह सभी दोषी करार दिये जा चुके हैं. अदालत इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस भी कह चुकी है, फिर भी जब ईमानदारी के लिए बनाए गए कानून से बेईमानी होने लगे या ऐसी आशंका हो तो क्या उसे बदल नहीं देना चाहिए? निर्भया के मां की मानें तो दोषियों के वकील एपी सिंह ने यहां तक कह दिया कि इन चारों को कभी फांसी नहीं होगी!
CJI ने जो कहा उसे किसी ने समझा!
यह बात कितनी सच और कितनी झूठ है यह तो वही जानें लेकिन ऐसा सुनकर ही रूह कांप उठती है कि कोई वकील कैसे किसी पीड़िता की मां से ऐसा कह सकता है? कैसे कोई कानून का इतना बेजा इस्तेमाल करने की ताकत रखता है? न्याय सभी को मिलना चाहिए लेकिन इस तरह से कानून के साथ बेईमानी का खेल रचाकर तो न्याय नहीं ही मिल पाएगा. अगर मिला तो भी वह किसी ना किसी के साथ अन्याय सरीखा होगा.
इस मामले के संदर्भ में तो खुद भारत के प्रधान न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे तक कह चुके हैं कि ‘फांसी की सजा के खिलाफ अपीलों का एक अंत आवश्यक है. दोषी को यह कभी नहीं लगना चाहिए कि फांसी की सजा से जुड़ा एक सिरा हमेशा खुला रहेगा और सजा को चुनौती दी जाती रहेगी.’
आज निर्भया की मां अकेली हैं. उनका परिवार अकेला है. वह लोग भी नदारद दिख रहे हैं जिन्होंने कभी निर्भया के न्याय के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज उठाई थी. ऐसा लग रहा है मानों चारो दोषी अदालत और न्याय व्यवस्था के साथ खेल खेल रहे हैं. यह बिल्कुल समझ के परे है कि आखिर कैसे इतनी नृशंस घटना को अंजाम देने के बाद भी अपने लिए रहम की भीख मांग सकता है? आखिर कहीं तो इसका अन्त होगा? और अगर फिलहाल अन्त नहीं है तो इसका अन्त कब तक बनाया जाएगा?
और जब खबर आई नहीं होगी निर्भया के दोषियों को फांसी…
शुक्रवार को जब देर शाम यह खबर आई कि निर्भया के दोषियों को 1 फरवरी 2020 के दिन फांसी नहीं होगी और डेथ वारंट अनिश्चितकाल के लिए रद्द कर दिया गया है, उसके कुछ घंटे पहले ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए जानकारी दी थी कि केंद्र सरकार ने कम से कम 1500 ऐसे कानूनों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जिनकी जरूरत आज के भारत में नहीं थी.
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि सरकार महिला सुरक्षा के लिए चिंतित है और उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की छूट दे रखी है. ताजा घटनाक्रम यानी निर्भया के दोषियों द्वारा याचिका दर याचिका का इस्तेमाल करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार की ओर से याचिका दी गई है कि कहीं तो इसका अन्त होना चाहिए. क्यों ना केंद्र की सरकार संसद में ऐसा कानून लेकर आए जो ईमानदारी के लिए बने कानून के साथ किसी भी तरह की बेईमानी को रोकने में सक्षम हो.
यह जरूरी है कि रेयरेस्ट ऑफ रेयरेस्ट केस की संज्ञा पा चुके मामलों में अदालत किसी भी तरह की नरमी ना बरते. अन्यथा महिला सुरक्षा के दावों को ठेस पहुंचेगी. सरकार और न्याय व्यवस्था की मंशा पर भी सवाल उठेंगे. यह सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे दरिंदों के पास कोई भी ऐसा मौका ना छोड़े कि वह कानून के साथ खिलवाड़ कर सकें.
बेहतर हो संसद बनाए कानून
बेहतर हो कि ऐसे दरिंदे अपनी जान बचाने के लिए कानून के साथ खेल ना सकें इसके लिए संसद आगे आए और कानून बनाए ताकि याचिकाओं की लंबी सूची पर लगाम लग सके. ताकि अब किसी को न्याय मिलने में देरी ना हो. ईश्वर करें अब इस देश और कोई निर्भया के साथ ऐसी कोई दरिंदगी ना हो.
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व्याकुल भारत
निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Case) मामले में फांसी फिर टाल दी गई है. अंग्रेजी के पांच शब्दों में एक बात कही गई है कि justice delayed is justice denied यानी देर दिया गया न्याय, न्याय नहीं है. इस मामले के दोषी मुकेश, विनय, पवन और अक्षय आये दिन कोई ना कोई नई याचिका लगा दे रहे हैं. कहने को तो यह उनके कानूनी अधिकार हैं लेकिन क्या यह सच नहीं है कि इस मामले ने पूरी तरह से यह बात खोल कर रख दी है कि जिस ईमानदारी के लिए कानून को इतना लचीला बनाया गया कि आखिरी वक्त तक व्यक्ति अपने न्याय के लिए लड़ सके, अब उसी के साथ बेईमानी हो रही है?
ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह सभी दोषी करार दिये जा चुके हैं. अदालत इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस भी कह चुकी है, फिर भी जब ईमानदारी के लिए बनाए गए कानून से बेईमानी होने लगे या ऐसी आशंका हो तो क्या उसे बदल नहीं देना चाहिए? निर्भया के मां की मानें तो दोषियों के वकील एपी सिंह ने यहां तक कह दिया कि इन चारों को कभी फांसी नहीं होगी!
CJI ने जो कहा उसे किसी ने समझा!
यह बात कितनी सच और कितनी झूठ है यह तो वही जानें लेकिन ऐसा सुनकर ही रूह कांप उठती है कि कोई वकील कैसे किसी पीड़िता की मां से ऐसा कह सकता है? कैसे कोई कानून का इतना बेजा इस्तेमाल करने की ताकत रखता है? न्याय सभी को मिलना चाहिए लेकिन इस तरह से कानून के साथ बेईमानी का खेल रचाकर तो न्याय नहीं ही मिल पाएगा. अगर मिला तो भी वह किसी ना किसी के साथ अन्याय सरीखा होगा.
इस मामले के संदर्भ में तो खुद भारत के प्रधान न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे तक कह चुके हैं कि ‘फांसी की सजा के खिलाफ अपीलों का एक अंत आवश्यक है. दोषी को यह कभी नहीं लगना चाहिए कि फांसी की सजा से जुड़ा एक सिरा हमेशा खुला रहेगा और सजा को चुनौती दी जाती रहेगी.’
आज निर्भया की मां अकेली हैं. उनका परिवार अकेला है. वह लोग भी नदारद दिख रहे हैं जिन्होंने कभी निर्भया के न्याय के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज उठाई थी. ऐसा लग रहा है मानों चारो दोषी अदालत और न्याय व्यवस्था के साथ खेल खेल रहे हैं. यह बिल्कुल समझ के परे है कि आखिर कैसे इतनी नृशंस घटना को अंजाम देने के बाद भी अपने लिए रहम की भीख मांग सकता है? आखिर कहीं तो इसका अन्त होगा? और अगर फिलहाल अन्त नहीं है तो इसका अन्त कब तक बनाया जाएगा?
और जब खबर आई नहीं होगी निर्भया के दोषियों को फांसी…
शुक्रवार को जब देर शाम यह खबर आई कि निर्भया के दोषियों को 1 फरवरी 2020 के दिन फांसी नहीं होगी और डेथ वारंट अनिश्चितकाल के लिए रद्द कर दिया गया है, उसके कुछ घंटे पहले ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए जानकारी दी थी कि केंद्र सरकार ने कम से कम 1500 ऐसे कानूनों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जिनकी जरूरत आज के भारत में नहीं थी.
राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि सरकार महिला सुरक्षा के लिए चिंतित है और उस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की छूट दे रखी है. ताजा घटनाक्रम यानी निर्भया के दोषियों द्वारा याचिका दर याचिका का इस्तेमाल करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार की ओर से याचिका दी गई है कि कहीं तो इसका अन्त होना चाहिए. क्यों ना केंद्र की सरकार संसद में ऐसा कानून लेकर आए जो ईमानदारी के लिए बने कानून के साथ किसी भी तरह की बेईमानी को रोकने में सक्षम हो.
यह जरूरी है कि रेयरेस्ट ऑफ रेयरेस्ट केस की संज्ञा पा चुके मामलों में अदालत किसी भी तरह की नरमी ना बरते. अन्यथा महिला सुरक्षा के दावों को ठेस पहुंचेगी. सरकार और न्याय व्यवस्था की मंशा पर भी सवाल उठेंगे. यह सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे दरिंदों के पास कोई भी ऐसा मौका ना छोड़े कि वह कानून के साथ खिलवाड़ कर सकें.
बेहतर हो संसद बनाए कानून
बेहतर हो कि ऐसे दरिंदे अपनी जान बचाने के लिए कानून के साथ खेल ना सकें इसके लिए संसद आगे आए और कानून बनाए ताकि याचिकाओं की लंबी सूची पर लगाम लग सके. ताकि अब किसी को न्याय मिलने में देरी ना हो. ईश्वर करें अब इस देश और कोई निर्भया के साथ ऐसी कोई दरिंदगी ना हो.
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