Opinion: कोरोना महामारी ने देश और दुनिया के मानव जीवन को संकुचित कर दिया

Opinion: कोरोना महामारी ने देश और दुनिया के मानव जीवन को संकुचित कर दिया
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अजय पांडेय
कोरोना महामारी ने देश और दुनिया के मानव जीवन को संकुचित कर दिया है, हमने स्पैनिश फ्लू, प्लेग, चेचक, हैजा, मलेरिया जैसी विकराल महामारियों को नही देखा, जिसने लाखों-लाख लोगों को काल के गाल में समां दिया. उनके किस्से पढ़े और अपने बडों से सुने जरूर हैं, कि गाँव के गाँव चंद दिनों में खत्म हो जाया करते थे, दास्तां सुनने भर से रुह कांप उठती है. आज कोरोना के चलते वो सब त्रासदी साक्षात होती हुई दिख रही है. हिन्दू, मुस्लिम, सिख,ईसाई आदि धर्मों को मानने वाले लोग आज अपने धार्मिक अनुष्ठान सार्वजनिक रूप से संपन्न करने से भी डरने लगे हैं. यहां तक कि प्रेरणा श्रोत धार्मिक स्थल भी इस महामारी मे बन्द पडे है.

कोरोना वायरस ने अनेक बदलाव किए हैं. वर्ष के प्रारंभ मे न ठीक से सर्दी पड़ी,न ही गर्मी ही दिख रही है. आने वाले समय में और क्या क्या बदलाव होने वाले हैं इस बारे मे कहना मुश्किल है. जनवरी से मार्च तक कोरोना के बारे में जितनी खबरें आयी उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. लोगों की आवाजाही बिना सावधानी के होती रही. यहां तक कि होली के अवसर पर अनेक शासन-प्रशासन में बैठे लोगों के निवास स्थानों पर होली मिलन समारोह बिना माक्स तथा समाजिक दूरी के ही होते रहे, 20 मार्च के बाद कुछ सक्रियता बढ़ी. 22 मार्च को प्रधानमंत्री ने पूर्ण रूप से लाकडाउन कर दिया शुरुआती दिनों में इसे समझने मे काफी समय लगा पर बाद में लोग इसके आदी हो गए.गर्मी के मौसम में होने वाले विवाह समारोह ना ही संपन्न हुए और ना ही शहनाईयों की गूंज सुनाई दी,

इस वायरस ने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया. मोहल्ले में बच्चे एक दूसरे का मुंह देखते नजर आते हैं. परीक्षाएं समाप्त होने के बाद गर्मी की छुट्टियों में यह पहला साल है,जब बच्चे अपने घर में ही रह कर पारिवारिक खेल और पारिवारिक पकवान का आनंद ले रहे.

एक आश्चर्यजनक बात यह भी है कि लॉक डाउन के दिनो में लोगों के बीमार पड़ने का क्रम भी बहुत कम हो गया है. यह सही है कि आर्थिक रूप से लोग टूट रहे हैं. केंद्र सरकार के द्वारा घोषित किए गए राहत पैकेज से निम्न एवं मध्यम वर्गीय परिवार पशोपेश में हैं. कि उससे आखिर कैसे और कितने दिनों तक राहत मिल पाएगी.

एक समय था जब सुबह उठकर सबसे पहले चाय और अखबार की चाहत होती थी. वह भी अब कम दिख रही है. समाचार पत्रों का प्रकाशन एवं प्रसार तो हो रहा है, पर इसकी गति पहले की तुलना में कम ही नजर आ रही है.

सोशल मीडिया का जादू सर चढ़कर बोल रहा है. यूट्यूब पर गृहणियां पकवानों की रैसिपी खंगालती नजर आती हैं . लोग अपने मोबाइल पर ही ईपेपर, यूट्यूब चैनल पर समाचार देख और सुन रहे हैं. वैसे लोग अब बन्दिशभरा जीवन जीने के अभ्यस्त हो गए है. धीरे धीरे लोगों ने महसूस कर लिया है कि सरकार के दिशा निर्देशों का पालन करके ही संक्रमण से बचा जा सकता हैं. देश में कोरोना के मरीजों की तादाद भले ही बढ़ रही हो पर ठीक होने वालों की तादाद भी उसी अनुपात में बढ़ रही है जो राहत की बात मानी जा सकती है.
लेकिन जिंदगी कभी इतनी

डरी-सहमी,अकेली नही थी. कोई किसी के घर पर नाही आता जाता है ,और नाही कोई अब किसी को बुलाता है ,फोन पर ही सारे रिश्ते समाहित हो गये. बहुत दिनों बाद यदि कोई मिले तो गले भी नहीं लगा सकते. दुर्भाग्य पूर्ण है दुख मे रोने के लिए जल्दी कोई कांधा भी नही देता,खुशी के जमाने तो अब आते ही नही. भगवान ने ये कैसा दुख दिया जो जाने का नाम ही नहीं लेता, लोग कहते है कि वक्त गुज़र जायेगा लेकिन दिन प्रतिदिन बढते संक्रमण से नही लगता की अभी दिन बदलेगा. यह महाप्रलय कहाँ जा कर थमेगा, अभी कहना असंभव है. लेकिन जिन्दगी जीतेगी, इसका भरोसा है. किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि विज्ञान के बल पर दुनिया फिर से रंगीन और गुलजार होगी. सब कुछ सामान्य होने मे समय जरूर लगेगा, लेकिन एक दिन येसा आयेगा जब हम भी आने वाली पीढी को करोना के किस्से सुनाएगे. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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