प्रकृति के प्रति क्या है हमारी जिम्मेदारी?
आधा देश जहां भीषण बाढ का सामना कर रहा है वहीं अनेक क्षेत्रों मंे सूखे का खतरा मड़रा रहा है । यानि ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मड़रा रहा है किन्तु समाज से लेकर सरकार तक अभी गंभीर नहीं है। प्रति वर्ष जब बाढ आती है तो उसके स्थाई समाधान ढूढे जाने की बात होती है किन्तु बाढ के गुजरते ही उसे हाशिये पर डाल दिया जाता है। यह प्रक्रिया लम्बे-समय से चलते-चलते अब खतरनाक स्थिति तक पहुंच चुकी है। यदि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन न रोका गया, पर्वत, नदियां, झील, पोखरों को संरक्षित कर जल, जमीन, जंगल को सुरक्षित न किया गया तो स्थितियां विकट होती जायेंगी।
प्रकृति के प्रति क्या है हमारी जिम्मेदारी?
आधा देश जहां भीषण बाढ का सामना कर रहा है वहीं अनेक क्षेत्रों मंे सूखे का खतरा मड़रा रहा है । यानि ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मड़रा रहा है किन्तु समाज से लेकर सरकार तक अभी गंभीर नहीं है। प्रति वर्ष जब बाढ आती है तो उसके स्थाई समाधान ढूढे जाने की बात होती है किन्तु बाढ के गुजरते ही उसे हाशिये पर डाल दिया जाता है। यह प्रक्रिया लम्बे-समय से चलते-चलते अब खतरनाक स्थिति तक पहुंच चुकी है। यदि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन न रोका गया, पर्वत, नदियां, झील, पोखरों को संरक्षित कर जल, जमीन, जंगल को सुरक्षित न किया गया तो स्थितियां विकट होती जायेंगी।
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