कैसे रुकेगा आपदा के समय बढ़ता भ्रष्टाचार?

कैसे रुकेगा आपदा के समय बढ़ता भ्रष्टाचार?
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अजय पांडेय
भारत जैसे विकासशील देशों में रोजाना ही ऐसे छोटे-बड़े हादसे तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को गुजरना पड़ता है. बाद में बचाव के लिए सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयास होते हैं उनमें न तो आपसी तालमेल होता है और न लोगों तक प्रभावी तरीके से इनका फायदा पहुँच पाता है बल्कि कई दूर-दराज के इलाकों में मदद पहुँचाने में काफी लंबा समय लग जाता हैं तब तक काफी धन जन की हानि हो जाती हैं.

इतिहास मे समय -समय पर स्पैनिश फ्लू, एशियाई फ्लू, हांगकांग फ्लू,सार्स, कोरोना वायरस कोविंद 19,एड्स, टीबी,तपेदिक,मलेरिया एबोला रक्तस्रावी ज्वर आऊटबर्क, जैसी विश्वव्यापी महामारियां आयी है. देश में बाढ,भूकंप, सुनामी, बिजली गिरने जैसी अनेक प्राकृति आपदाएं आती रही है. आपदाओं से निपटने के लिए सरकारे बहुत सारी योजनाएं चलाती हैं.लेकिन उस योजना का क्रियान्वयन कराने वाले शासन-प्रशासन मे बैठे लोग उस पैसे का फर्जी बिल बाऊचर बना कर समायोजन करा देते है. इसलिए योजना का लाभ उचित जगह नहीं पहुंच पाता. इसमे बहुतायत मात्रा में नेता,अधिकारी,कर्मचारी गण अपनी जेबें भर लेते है

ऊपर बैठे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री भले ही आर्दश की बात करें कि मै जो भी पैसा भेजता हूँ वह आम जनता तक शत -प्रतिशत पहुंच जा जाता हैं उन्हें भी यह पता है कि धरातल पर इसका कोई असर नही है. वर्ना जानकारी करने की जरूरत ही क्या?

उसी तरह देशव्यापी कोरोना महामारी मे जिस तरीके से सरकारी योजनाओं का बंदरबांट किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं. चाहे प्रवासी मजदूरों की मजदूरी का सवाल हो या उनके घर पहुंचाने का, स्वास्थ्य परीक्षण हो या मनरेगा का, राशन कार्ड की समस्या हो या राशन वितरण की हर जगह ल़ूटपाट मचा हुआ है. ऊपर से नीचें तक लगभग सभी शासन- प्रशासन मे बैठे लोग अधिकारी कर्मचारी योजनाओं का बंटाधार करने मे लगे है.
दुर्भाग्य तो यह है कि विपक्ष में बैठे लोग यदि सरकार की आलोचना के बजाय अपने नेताओ कार्यकर्ताओं को जिला,ब्लॉक ,गांव तथा बूथ स्तर पर योजनाओं का सही तरीके से दबाव बनाकर क्रियान्वयन करा दे तो काफी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाय लेकिन किसी को राजनीति से फुर्सत ही नही है

आज इस महामारी मे सबसे प्रमुख समस्या रोटी और रोजगार की है. प्रवासी मजदूरों की इतनी दुर्भाग्यपूर्ण और दयनीय स्थिति हैं कि लंबी-लंबी दूरी तय कर लोग पैदल और साइकिल से चलकर घर वापस जा रहे है. लाकडाऊन मे कारोबार और उद्योग धंधे पूरी तरह से ठप हैं मजदूरो के सामने रोटी और रोजगार का संकट खड़ा हो गया है गरीबों को उनके परिवार के लिए दो जून की रोटी के लाले पड़ गए है.सरकार दो रुपये किलो गेंहूं और तीन रुपये किलो चावल प्रति व्यक्ति पांच किलो दे रही हैं. साथ में तीन महीने अतिरिक्त अनाज भी.

गरीबों को मुफ्त दिया जा रहा हैं लेकिन ग्राम प्रधान तथा कोटेदार मिल कर इस योजना को चट करने मे लगे हुए हैं. सरकारी राशन दुकानों की दुकानों से मिलने वाले मुफ्त राशन से संचालक अपनी जेबें भर रहे हैं. इन दुकानों से मिलने वाले मुफ्त चावल का जहां पैसा लिया जा रहा है. वहीं गुड़ और शक्कर भी मनमाने दामों पर बेचे जा रहे हैं. ये मामला किसी एक सरकारी दुकान का नहीं है. बल्कि इस इलाके के दर्जनों गांवों में संचालित दुकानों पर गरीबों को इसी तरह लूटा जा रहा है.मुफ्त राशन वितरण मे सरकार की मंशा पर पानी फेर रहे हैं.

घर वापसी करने वाले मजदूरों के लिए रोजगार के नाम पर मनरेगा ही एक सहारा है. लेकिन ग्राम प्रधान राजनैतिक द्वेष और निजी स्वार्थ परता के कारण सभी को काम ही नही देता.और अगर काम देते भी है तो काम के नाम पर उनसे आठ दश दिहाड़ी ले लेते है  यहीं हाल स्वास्थ्य विभाग का मास्क, सेनेटाईजर,जांच, कोरेनटाईन की व्यवस्था मे खामिया आये दिन सामने आ रही है.

प्रवासी मजदूरों के पहुचाने तथा उनके खाने पीने की व्यवस्था के नाम पर लूट-पाट आए दिन उजागर हो रहे है यह देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण हैं.
इसलिए आवश्यकता है कि सरकार इस पर कठोर कदम उठाए. जिससे आपदाओं के समय हो रहे इस तरह की भ्रष्टाचार की घटनाओं को रोका जा सके. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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