नल नहीं छूने दे रहे लोग, लॉकडाउन में लौटे लोगों का कुआनों बनी सहारा
प्रदूषण से कराह रही नदियों का पुरातन अस्तित्व वापस लाने की कवायदे भले ही उसे उसका पुराना स्वरूप वापस न दिला पाई, लेकिन कोरोना संकट के लॉक डाउन ने उसे अपना स्वरूप वापस पाने का अवसर दे दिया. आम जनजीवन भले ही लॉक डाउन के बीच ठहरी जिंदगी से परेशान है, लेकिन प्रकृति के पास मुस्कुराने की वजह मिल गई है. तिल- तिल कर मर रही ‘सर्वेश्वर’ की कुआनों की निर्मल जलधारा का मनोरम दृश्य आने जाने वालो को लुभा रहा है. लोगो के मुंह से बेखास्ता निकल रहा है कि अरे ! यह वहीं कुआनों है जो काला पड़ गई थी.
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किसी कवि की यह लाइने ‘भाव का परिधान मैला हो गया है, जिस नदी का जल सदा अमृत लगा था उस नदी का जल विषैला हो गया है’ अब बीते दिनों की बात हो गई है. दो माह के भीतर ही वातावरण में आए बदलाव के चलते जीवनरेखा कही जाने वाली नदियां एक बार फिर से प्रकृति का सुखद अहसास करा रही है. नदियों का यह बदलाव किसी भगीरथ प्रयास से नहीं बल्कि प्रकृति में घुलते जहर के न फैलने से हुआ है.
यह भी पढ़ें: कानपुर मेट्रो प्रोजेक्ट ने पकड़ी रफ्तार: मेट्रो टनल तैयार, यात्रियों को जल्द मिलेगी सुविधाइस बदलाव को देखकर प्रकृति मंद मंद मुस्करा रही है. साफ मौसम, पक्षियों के कलरव और नदियों की स्वच्छ निर्मल धारा ने वातावरण को पूरी तरह शुद्ध कर दिया है. अन्य प्रदेशो से वापस आ रहे श्रमिक वैश्विक बीमारी कोराना के चलते नहाने के लिए नदियों का सहारा ले रहे है उनका कहना है कि वे गांव पहुंच भी गये तो उन्हे कोई अपना नल प्रयोग नहीं करने देगा. महाराष्ट्र राज्य के पुणे से बस्ती पहुंचें श्रमिक अपनी थकान मिटाने के लिए कुआनों में स्नान कर रहे हैं .महसों के प्रमोद ने बताया कि गांव पहुचने पर 21 दिनो के लिए घर से बाहर ही रहना है जहां नहाने के लिए भी समस्या होगी. हम लोग कहा नहायेंगे ऐसे में नदी ही सबसे बेहतर लगा ,जहां कोई रोक टोक तो नही है.
वहीं पिपरा गौतम के पाथरभीर में महाराष्ट्र के मलाड में शटरिंग का काम कर रहे योगेन्द्र, सिब्बड सहित 15 श्रमिक कुआनों के किनारे पालीथीन तान कर रह रहे है. उनकी जीवनचर्या कुआनों किनारे पर ही चल रही है,वह कहते है कि यहां हमें कोई रोक टोक तो नही है हम नदी में स्नान आदि कर रहे है जबकि गांव में हम नल भी छू ले तो लोग भडक जाते है. अब हम यही कुआनों के किनारे बड़े सकून से अपना समय बिता रहे है. उनका कहना है कि हमें नदी के किनारे गांव से ज्यादा अच्छा लग रहा है.
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