गेहूं बेचकर अपनों को वापस बुलाया गांव, अब प्लास्टिक तान कर बिता रहे क्वारंटीन

गेहूं बेचकर अपनों को वापस बुलाया गांव, अब प्लास्टिक तान कर बिता रहे क्वारंटीन
Basti Lockdown Coronavirus

-जितेंद्र कौशल सिंह- बस्ती (भाब). पहले रोजी रोटी की तलाश में घर छोड़कर दूसरे प्रदेशों में गये और अब थके हारे भूख से परेशान घरोंं को पहुंच रहे परदेशियों पर संकट बरकरार है. परिवार की गृहस्थी चलाने के लिए घर परिवार छोड़कर परदेश के लिए निकले गरीबों ने शायद सपने मे भी नहीं सोचा रहा होगा कि उनकी मुसीबतें यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ेंगी. वैश्विक महामारी कोरोना के चलते लॉक डाउन हुआ तो किसी तरह कुछ दिन गुजार लिए लेकिन जब संकट बढ़ा और खाने तक के लाले पड़ गये. तो उन्हें घर की चिन्ता सताने लगी. चिलचिलाती धूप,मौसम से बेपरवाह भूख से बिलबिलाते वे पैदल ही घरों के लिए निकल पड़े़. बिना इस बात की चिन्ता किये कि सैकड़ों किलोमीटर की दूरी वे कैसे तय करेंगें.

पांव में छाले भूख से सूखी अतड़िया भी उनके घर वापसी के हौसलो को कम नहीं कर सकी. कहीं साधन मिला तो वे ट्रक व अन्य वाहनों पर सवार होकर कुछ किलोमीटर की यात्रा तय कर लिए. मन में यह विश्वास था कि परदेश में भले ही वे बेगाने हो गये लेकिन परिवार में अपनों के बीच अपनों के साथ सुख के पल बिता सकेगें. लेकिन यहां भी उनकी दुश्वारियां कम नहीं हुईं. लम्बी यात्रा और थकान के बीच गांव तक पहुचें तो एक अजीब सा सुखद अहसास हुआ लेकिन वह भी क्षणिक निकला. बाहर से आने के कारण उन्हें घरों मे प्रवेश तक नहीं मिल पाया. चिलचिलाती घूप में पन्नी का छाजन डाल वह क्वारंटीन के दिन बिताने को लगे.

जिन कारखानों में यह खून पसीना बहाकर काम कर रहे थे उन्होंने भी मदद के नाम पर अपने हाथ खड़े कर दिये. तो परिजनों ने गांव से गेंहू बेचकर उन्हें कुछ रूपये तक भिजवाये. सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर उनकी भूख प्यास के आगे तब बौना हो गया जब वह कुलबुलाती अतड़ियों की करूण पुकार और चिलचिलाती धूप में पावों के फूटते छाले, उनके घर तक पहुंचने के सफर में साथ साथ चलते रहे. लेकिन घर पहुंचने के बाद भी वह अपनों से दूर गांव के बाहर 21 दिनो का वनवास काट रहे है.

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जनपद के ज्यादातर गावों में परदेशियों की घर वापसी लगातार हो रही है. बहादुरपुर ब्लाक के पिपरा गौतम गांव में प्रवासी मजदूरो के आने के साथ ही वह होम क्वारंटीन हो रहे है. लेकिन पाथरभीर पुरवा के गरीब परिवारों के पास जहां एक ही कमरा है तो वह कहां जाय. ऐसे में वह गांव के बाहर पालीथीन तानकर अपना दिन बिता रहे है. अकेले पिपरा गौतम गांव में ही घरों को लौटे 14 प्रवासी गांव के बाहर खुले आसमान तले पालीथीन के नीचे रह रहे हैं. यहां उनके लिए न तो पानी की व्यवस्था न ही कोई और इन्तजाम . गांव के लोग भी इन्हें आशंकित निगाह से देख रहे है. उनके पानी के संकट को देखते हुए ग्राम प्रधान हाकिम सिंह ने एक हैण्ड पम्प का इंतजा कराया है. ताकि यहां रह रहे प्रवासी नहाने और पीने के पानी के लिए परेशान न हों.

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वैसे तो गांव में लगभग 80 लोग ऐसे है जो बाहर से आए हैं लेकिन इनमें से अधिकांश घरों मे ही क्वरांटीन हैं. अन्य बचे लोगो के खाने पीने की व्यवस्था घर से आये राशन से हो रही है. वे वहीं बना खा रहे है. मुम्बई के मलाड में शटरिंग का काम कर रहे योगेन्द्र राजभर, विनोद राजभर, संतोष राजभर, प्रमोद राजभर, दिलीप राजभर ,सिब्बड़ राजभर ने बताया कि जैसे तैसे एक महीना बिताया, जब ठीकेदार ने पैसे देने से इंकार कर दिया तो घर से परिजनो ने गेहूं बेचकर पैसा भेजा. इसके बाद हम सब लगभग 35 किलो मीटर चलकर शहर के बाहर आये. वहां से प्रति व्यक्ति 3500 रूपया ट्रक का भाड़ा देकर बस्ती पहुचे वहां से गांव तक का सफर पैदल तक किया.घ र पहुचें तो कोरोना के चलते उन्हे गांव के बाहर रहना पड़ रहा है. यह सिर्फ इन मजदूरो का दर्द नहीं है बल्कि जिले के अन्य गावों की तस्वीर कमोबेश ऐसी ही है.

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