Basti Panchayat Chunav Result: चुनाव के बाद गर्म हुआ गांव का माहौल
-भारतीय बस्ती संवाददाता-
बस्ती. चुनाव के परिणाम आने के बाद गावो में कही खुशी कही गम का माहौल है. जीते हुए प्रत्याशियो के खेमें जहां दावतो का दौर जारी है. वही हारे हुए प्रत्याशी प्रचार के दौरान दावत उडाने वालो से अब वसूली के लिए लाठी डंडा लेकर उन्हे तलाश रहे है. न मिलने पर धमकी और आमने सामने होने चुनाव के दौरान दिये गये पैसे की वसूली कर रहे है. ऐसे में गावो में हिंसक घटनाओ की पृष्ठभूमि तैयार हो रही हैं.
देर शाम तक परिणाम आने के साथ ही जनपद के कई गावो में मार पीट की खबरे मिलती रही. बहादुरपुर, हर्रैया ब्लाक के कई गांवो में दलित पिछडी जातियों के मतदाताओ को पीटा गया. तो कुछ दूसरे गावो में रिश्तेदारो के यहां दिन गुजार रहे है. हालत यह है कि जिस वार्ड में दबंग प्रधान हार गये है वहां के मतदाताओ और जीते हुए प्रत्याशियो के समर्थकों को धमकी दने के साथ ही मार पीट भी कर रहे है. ज्यादातर गावों हार पर समीक्षा की जगह हारे हुए प्रत्याशी नोटो की वसूली के लिए जूझ रहे है. वसूली और गावो में उपजी गुटबंदी के चलते सबसे ज्यादा परेशानी उन मतदाताओ को है जो लांकडाउन के दौरान शहर से गांवो में आकर समय बिता रहे है. मतदान के दिन उन्हाने मतदान तो कर दिया लेकिन हारे हुए प्रत्याशियो को भरोसा कैसे दिलाये कि उन्ही को वोट दिया है.
उन गावो की स्थितियां और भी बिगड सकती है जिन गंावो ग्राम प्रधान के सहयोगियो एवं परिवार के पास ही राशन वितरण की दुकान है. इस माह का राशन कोटेदार की दुकान तक पहुच चुका है. अधिकतम गावो में जल्द ही वितरण शुरू होना है. ऐसे यदि पूर्व प्रधान को वोट नही दिया है तो उसके घर तक राशन लेने जाने कौन सोचे ? ऐसे गावो में लगभग 10 से 20 प्रतिशत आबादी राशन लेने कतरा रही हैं इन्तजार में है कि थोडा माहौल बदले तो राशन की दुकान तक जाये. एक तरफ कोरोना के कारण लोगो को रोजगार बंद है. वही गांव का चुनाव के कारण खराब हुए माहौल को लेकर प्रवासी कामगारो की समस्याये कम होन का नाम नही ले रही है. मतगणना के ही दिन रूधौली ब्लाक के महुआ गावं में चुनावी रंजिश को लेकर राम अनुज साथ मारपीट हुई,उनकी स्कार्पियो गाडी को तोड दिया गया. वही 3 मई महुआ गंव मे ही राम अचल ने सात लेागो के विरूद्ध मारने पीटने का मुकदमा दर्ज कराया.
दूसरी ओर नजर दौडायें तो कोरोना की दूसरी लहर अब गावो की खुशियां बहा ले जाना चाहती है.कभी एक अल्पायु मौत से गांव मात मे डूब जाता था लेकिन अब हालात यह कि चुनाव के चक्रव्यूह में संवेदनशीलता दम तोड चुकी है कई गावो में मौते होती रही लेकिन चुनावी नारो में परिजनो की चीखे दबकर रह गई. एक तरफ जहां कोरोना से हो रही मौतो का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है वही दूसरी ओर ज्यादातर लोग कोविड प्रोटोकाल का पालन करना भी जरूरी नही समझ रहे है. घर घर लोगो को बुखार खांसी की समस्या से पीडित है लेकिन घरेलू उपचार से लेाग खुद को ठीक भी कर रहे है. वही लगातार हो रही मौतो से मृतक के परिजनो मे तो दहशत है ग्रामीण भी उन मुहल्लो में नही जा रहे है जहां कोराना पाजिटिव की मौत हुई है. जनपद का शायद ही कोई ऐसा ब्लाक हो जहां कोविड से मौते न हो रही हो और लोग बीमार न पड रहे हो ले.
ऐसे में सबसे बडी समस्या यह कि कोरोना पाजिटिव या अन्य ब्रहमभोज एवं गांव मे हो रहे वैवाहिक कार्यक्रमो में एक ओर तो कोविड पाजिटिव मोहल्ले से कार्य्रकम में शामिल हो लोगो से दूरी बना रहे है वही खुद ही ऐसे आयोजनो में भारी भीड जमा हो रही है.
सरकार की ओर घोषित लांकडाउन का असर शहरो में कुछ दिख भी रहा है लेकिन गावो में अब भी हालत जस के तस बने हुए है.दिन भर खुली चाय, पान की दुकाने गांव राजनीतिक खलिहरो का अडडा बन चुकी है. छुटभैया नेताओ के घर दरबार सजाकर चुनावी हार जीत की समीक्षा का दौर जारी है. वही स्कूलो के बंद हाने से बच्चों भीड स्कूलेा पढाई के लिए तो नही जा रही है लेकिन स्कूलो खेल के मैदान में क्रिकेट का खेल जारी है. कोराना से जूझ रहे गावो में बीमारी के बढ़ने के इस खुले आमत्रंण पर न ही प्रशासन की निगाह है न तो ग्रामीणो इसकी परवाह. कोरोना का थोडा सा भय अगर दिखता भी है तो केवल उन्ही घरो के आस पास जंहा के लोगो ने इस बीमारी के चलते अपने परिजनो को खोया है बाकी गांव में न ही लांकडाउन का असर है नही कोरोना का भय. कोराना की इस भीषण महामारी और चुनावी महासमर के बाद गांवो में एक अदृश्य खौफ भरे सन्नाटे के साथ दहशत है. समय रहते यदि कोरोना को लेकर गावो में प्रशासन ने कडाई नही किया तो हालात कुछ भी हो सकते है.
Basti Panchayat Chunav Result: चुनाव के बाद गर्म हुआ गांव का माहौल
-भारतीय बस्ती संवाददाता-
बस्ती. चुनाव के परिणाम आने के बाद गावो में कही खुशी कही गम का माहौल है. जीते हुए प्रत्याशियो के खेमें जहां दावतो का दौर जारी है. वही हारे हुए प्रत्याशी प्रचार के दौरान दावत उडाने वालो से अब वसूली के लिए लाठी डंडा लेकर उन्हे तलाश रहे है. न मिलने पर धमकी और आमने सामने होने चुनाव के दौरान दिये गये पैसे की वसूली कर रहे है. ऐसे में गावो में हिंसक घटनाओ की पृष्ठभूमि तैयार हो रही हैं.
देर शाम तक परिणाम आने के साथ ही जनपद के कई गावो में मार पीट की खबरे मिलती रही. बहादुरपुर, हर्रैया ब्लाक के कई गांवो में दलित पिछडी जातियों के मतदाताओ को पीटा गया. तो कुछ दूसरे गावो में रिश्तेदारो के यहां दिन गुजार रहे है. हालत यह है कि जिस वार्ड में दबंग प्रधान हार गये है वहां के मतदाताओ और जीते हुए प्रत्याशियो के समर्थकों को धमकी दने के साथ ही मार पीट भी कर रहे है. ज्यादातर गावों हार पर समीक्षा की जगह हारे हुए प्रत्याशी नोटो की वसूली के लिए जूझ रहे है. वसूली और गावो में उपजी गुटबंदी के चलते सबसे ज्यादा परेशानी उन मतदाताओ को है जो लांकडाउन के दौरान शहर से गांवो में आकर समय बिता रहे है. मतदान के दिन उन्हाने मतदान तो कर दिया लेकिन हारे हुए प्रत्याशियो को भरोसा कैसे दिलाये कि उन्ही को वोट दिया है.
उन गावो की स्थितियां और भी बिगड सकती है जिन गंावो ग्राम प्रधान के सहयोगियो एवं परिवार के पास ही राशन वितरण की दुकान है. इस माह का राशन कोटेदार की दुकान तक पहुच चुका है. अधिकतम गावो में जल्द ही वितरण शुरू होना है. ऐसे यदि पूर्व प्रधान को वोट नही दिया है तो उसके घर तक राशन लेने जाने कौन सोचे ? ऐसे गावो में लगभग 10 से 20 प्रतिशत आबादी राशन लेने कतरा रही हैं इन्तजार में है कि थोडा माहौल बदले तो राशन की दुकान तक जाये. एक तरफ कोरोना के कारण लोगो को रोजगार बंद है. वही गांव का चुनाव के कारण खराब हुए माहौल को लेकर प्रवासी कामगारो की समस्याये कम होन का नाम नही ले रही है. मतगणना के ही दिन रूधौली ब्लाक के महुआ गावं में चुनावी रंजिश को लेकर राम अनुज साथ मारपीट हुई,उनकी स्कार्पियो गाडी को तोड दिया गया. वही 3 मई महुआ गंव मे ही राम अचल ने सात लेागो के विरूद्ध मारने पीटने का मुकदमा दर्ज कराया.
दूसरी ओर नजर दौडायें तो कोरोना की दूसरी लहर अब गावो की खुशियां बहा ले जाना चाहती है.कभी एक अल्पायु मौत से गांव मात मे डूब जाता था लेकिन अब हालात यह कि चुनाव के चक्रव्यूह में संवेदनशीलता दम तोड चुकी है कई गावो में मौते होती रही लेकिन चुनावी नारो में परिजनो की चीखे दबकर रह गई. एक तरफ जहां कोरोना से हो रही मौतो का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है वही दूसरी ओर ज्यादातर लोग कोविड प्रोटोकाल का पालन करना भी जरूरी नही समझ रहे है. घर घर लोगो को बुखार खांसी की समस्या से पीडित है लेकिन घरेलू उपचार से लेाग खुद को ठीक भी कर रहे है. वही लगातार हो रही मौतो से मृतक के परिजनो मे तो दहशत है ग्रामीण भी उन मुहल्लो में नही जा रहे है जहां कोराना पाजिटिव की मौत हुई है. जनपद का शायद ही कोई ऐसा ब्लाक हो जहां कोविड से मौते न हो रही हो और लोग बीमार न पड रहे हो ले.
ऐसे में सबसे बडी समस्या यह कि कोरोना पाजिटिव या अन्य ब्रहमभोज एवं गांव मे हो रहे वैवाहिक कार्यक्रमो में एक ओर तो कोविड पाजिटिव मोहल्ले से कार्य्रकम में शामिल हो लोगो से दूरी बना रहे है वही खुद ही ऐसे आयोजनो में भारी भीड जमा हो रही है.
सरकार की ओर घोषित लांकडाउन का असर शहरो में कुछ दिख भी रहा है लेकिन गावो में अब भी हालत जस के तस बने हुए है.दिन भर खुली चाय, पान की दुकाने गांव राजनीतिक खलिहरो का अडडा बन चुकी है. छुटभैया नेताओ के घर दरबार सजाकर चुनावी हार जीत की समीक्षा का दौर जारी है. वही स्कूलो के बंद हाने से बच्चों भीड स्कूलेा पढाई के लिए तो नही जा रही है लेकिन स्कूलो खेल के मैदान में क्रिकेट का खेल जारी है. कोराना से जूझ रहे गावो में बीमारी के बढ़ने के इस खुले आमत्रंण पर न ही प्रशासन की निगाह है न तो ग्रामीणो इसकी परवाह. कोरोना का थोडा सा भय अगर दिखता भी है तो केवल उन्ही घरो के आस पास जंहा के लोगो ने इस बीमारी के चलते अपने परिजनो को खोया है बाकी गांव में न ही लांकडाउन का असर है नही कोरोना का भय. कोराना की इस भीषण महामारी और चुनावी महासमर के बाद गांवो में एक अदृश्य खौफ भरे सन्नाटे के साथ दहशत है. समय रहते यदि कोरोना को लेकर गावो में प्रशासन ने कडाई नही किया तो हालात कुछ भी हो सकते है.
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