लॉक डाउन में सकारात्मक सोच अपनाएं -डॉ.पुर्णेश
डॉ पूर्णेश ने कहा कि जब संकट बड़ा हो तो संघर्ष भी बड़ा अपेक्षित होता है. जीवन को नई दिशा देने एवं संकट से मुक्ति के लिए काँटों की ही नहीं, फूलों का गड़ना भी जरूरी होती है. अगर हम काँटे ही काँटे देखते रहे तो फूल भी काँटे बन जाते हैं . हकीकत तो यह है कि हँसी और आँसू दोनों अपने भीतर होते हैं . अगर सोच को सकारात्मक बना लें तो जीवन रस मय हो जाएगा और संकट को हारना ही होगा इसलिए लॉक डाउन के प्रति सकारात्मक सोच अपनाए,.
लॉक डाउन की लक्ष्मन रेखा बहुत हद तक समाज के लिए वरदान साबित हुई है . 25 मार्च को ही शुरू हुए इस लॉक डाउन में प्रकृति तथा मनुष्य दोनों को स्वयं को निखारने का मौका मिला है. चाहे प्रकृति हो या मनुष्य, दोनों ने ही लॉक डाउन का लाभ उठाया है .
यह भी पढ़ें: यूपी बजट 2026-27: चुनाव से पहले 9.12 लाख करोड़ का मास्टरस्ट्रोक, विकास और रोजगार पर बड़ा फोकसलॉक डाउन के चलते ही आज प्रकृति की वास्तविकता के दर्शन हो रहे हैं . आसमान से शुक्र ग्रह तथा तारे साफ- साफ दिखाई दे रहे हैं . जो गंगा नदी पिछले 34 सालों में 30 हजार करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद साफ नहीं हो पाई वही गंगा नदी कानपुर में आचमन लायक हो गई है . उद्योग और फैक्ट्रियों के बंद होने से धरती एक बार फिर चैन से साँस ले पा रही है. पक्षियाँ फिर से चहचहाने लगीं हैं, पशु फिर से स्वतंत्र होकर घूम रहे हैं. हिमालय की चोटियाँ जालंधर से ही दिखाई देने लगीं हैं . देखा जाए तो लॉक डाउन ने प्रकृति का वह रूप दिखाया है, जिसके बारे में आज की पीढी सिर्फ सुन सकती थी .
कहा कि कोरोना वैश्विक महामारी से बचाव हेतु सोशल डिस्टेंस बना कर ही अपने कार्यों को संपादित करे व सरकार द्वारा जारी लॉक डाउन के दिशा निर्देशों का पालन करे.
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