58 साल बाद खत्म हुआ इंतजार! यूपी के 17 जिलों के 25 गांवों में पूरी हुई चकबंदी

58 साल बाद खत्म हुआ इंतजार! यूपी के 17 जिलों के 25 गांवों में पूरी हुई चकबंदी
58 साल बाद खत्म हुआ इंतजार! यूपी के 17 जिलों के 25 गांवों में पूरी हुई चकबंदी

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में वर्षों से अधूरे पड़े चकबंदी मामलों को सुलझाने की दिशा में चकबंदी विभाग को बड़ी सफलता मिली है. लंबे समय से अटकी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाते हुए विभाग ने प्रदेश के 17 जिलों के 25 गांवों में चकबंदी कार्यों को पूरा कर लिया है. इससे जमीन से जुड़े विवादों का समाधान हुआ ही है, साथ ही ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक व्यवस्था को भी मजबूती मिली है.

पुराने मामलों को निपटाने पर जोर

चकबंदी विभाग ने उन गांवों को प्राथमिकता दी, जहां दशकों से चकबंदी की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई थी. विभाग का उद्देश्य था कि कानूनी अड़चनों, अभिलेखों की कमी और आपसी विवादों के कारण रुके मामलों को नियमों के अंतर्गत अंतिम रूप दिया जाए. इसके लिए जिला प्रशासन और चकबंदी अधिकारियों के बीच लगातार समन्वय बनाया गया.

डीएम के प्रस्तावों पर मिली मंजूरी

चकबंदी आयुक्त डॉ. हृषिकेश भास्कर याशोद ने इस विषय पर जानकारी देते हुए कहा कि संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों की ओर से भेजे गए प्रस्तावों पर विचार के बाद चकबंदी कार्यों को पूर्ण करने की स्वीकृति दी गई. इसके बाद विभागीय स्तर पर औपचारिकताएं पूरी कराई गईं और अधिनियम के तहत प्रक्रिया को समाप्त किया गया.

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चकबंदी आयुक्त डॉ. हृषिकेश भास्कर याशोद ने यह भी बताया कि प्रदेश में स्थित संतकबीरनगर, बस्ती, कानपुर नगर, प्रयागराज, उन्नाव, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, लखीमपुर खीरी, कन्नौज, प्रतापगढ़, फतेहपुर, सोनभद्र, मीरजापुर, सीतापुर, सुलतानपुर और बरेली के 25 गांवों में चकबंदी कामों को पूर्ण रूप से समाप्त कर लिया गया है. 

दशकों से लंबित थे कई गांवों के मामले

कुछ गांवों में चकबंदी का इतिहास काफी पुराना रहा है. आजमगढ़ जिले के उबारपुर लखमीपुर गांव में चकबंदी की अधिसूचना वर्ष 1967 में जारी हुई थी, लेकिन जरूरी अभिलेख समय के साथ गायब हो गए थे. इस मामले में एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी और करीब 58 वर्षों से प्रक्रिया अधूरी पड़ी थी.

इसी जिले के गहजी गांव में वर्ष 1972 में चकबंदी शुरू हुई थी, लेकिन ग्रामीणों के बीच सहमति न बनने के कारण मामला लगातार उलझता चला गया.

अदालत और विवाद बने बड़ी वजह

गहजी गांव में चकबंदी को लेकर एक पक्ष ने वर्ष 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. हालांकि साल 2019 में स्थगन समाप्त होने के बाद भी नियमानुसार आगे की कार्रवाई नहीं हो सकी. नतीजतन, यहां चकबंदी प्रक्रिया लगभग 53 वर्षों तक लंबित बनी रही.

अधिकारियों की सख्ती से निकला समाधान

इन जटिल मामलों की समीक्षा खुद चकबंदी आयुक्त ने की. इसके बाद जिलाधिकारियों और विभागीय अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि ग्रामीणों के बीच आपसी सहमति बनाकर समस्या का हल निकाला जाए. अधिकारियों ने गांवों में बैठकें कराईं, नया अभिलेख तैयार कराया और अंततः चकबंदी की प्रक्रिया को पूरा कराया गया.

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शोभित पांडेय एक समर्पित और अनुभवशील पत्रकार हैं, जो बीते वर्षों से डिजिटल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। खबरों की समझ, तथ्यों की सटीक जांच और प्रभावशाली प्रेज़ेंटेशन उनकी विशेष पहचान है। उन्होंने न्यूज़ राइटिंग, वीडियो स्क्रिप्टिंग और एडिटिंग में खुद को दक्ष साबित किया है। ग्रामीण मुद्दों से लेकर राज्य स्तरीय घटनाओं तक, हर खबर को ज़मीनी नजरिए से देखने और उसे निष्पक्षता के साथ प्रस्तुत करने में उनकी विशेष रुचि और क्षमता है।