पाकीज़ा पार्ट -2: कैसे पूरा हुआ फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ का संगीत?
नंदनी अग्रवाल
हिंदी सिनेमा के इतिहास में किस्सा उस फिल्म का जिस वक्त सिनेमा हुआ करता था. जी हां बॉलीवुड नहीं हुआ था और ना ही फिल्म इंडस्ट्री कही जाती थी, कहा जाता था तो सिर्फ सिनेमा . ऐसे में महान और फिल्मों के जादूगर जो कैमरे की लैंस से एक नयी इतिहास लिखने को बेचैन थे, सही समझा आपने बात कमाल अमरोही की कर रही हूं. कमाल साहब के नाम में कमाल इसलिए भी होगा शायद उनके वालिद साहब को पता था कि ये एक दिन सच में कमाल करेगा. बात कमाल अमरोही की उस जादूगरी की जो उन्होंने सोची सन् 1955 में थी. जिसे आप और हम फिल्म इतिहास में एक जादू के रूप में मान सकते है. एक ख्वाब जिसे कमाल साहब ने देखा और नाम दिया ‘पाकीज़ा’ .
कमाल साहब उन दिनों अपनी बेगम मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के साथ भारत के दक्षिण में सुकून के दिन गुजार रहे थे. कमाल साहब ने ये सोचा कि जैसे लोग ताजमहल देखकर उसे दो प्यार करने वाले की निशानी के रूप में याद करते है. कुछ ऐसा हो कि सिनेमा में जब भी बात हो तो कमाल-मीना का नाम लोग ताउम्र याद करें . ऐसे में कमाल साहब ये भी चाहते थे कि एक ऐसी फिल्म बने जिससे मीना कुमारी इस सिनेमा जगत में एक स्टार के रूप छा जाएं और भारतीय सिनेमा में महान अदाकारा के नाम से जानी जाएं.
अपने दिल की बात कमाल साहब ने मीना कुमारी को बतायी और मीना जी ने हामी भरी. उसके बाद सन् 1958 में कहानी तो लिखी जा चुकी थी. फिर खोज़ शुरू हुई मशहूर फिल्म ‘पाकीजा’ के दमदार संगीत और गाने को लिखने वाले दिग्गज की . कमाल साहब ने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी और कैफ़ भोपाली से बात की . गीत लिखने के बाद बात संगीत की हुई और गुलाम मोहम्मद साहब को इस ऐतिहासिक फिल्म के लिए कहा गया.

गुलाम मोहम्मद साहब ने बेहतरीन संगीत तो दी लेकिन फिल्म में देरी की वजह से ( देरी के कारण भी आनेवाले पोस्ट में लिखूंगी) तब तक मौत हो चुकी थी. कमाल और मीना कुमारी के बीच रिश्तो की तकरार की वजह से 1958 में शुरू हुई शूटिंग को रोकना पड़ा. फिर ये शूटिंग शुरू 1968 में हुई यानि 10 साल बाद ‘पाकीज़ा’ फिर ‘साउंड,लाइट और एक्शन’ की आवाज़ सुनी. खैर पहले भी बता चुकी हूँ कि देरी की वजह अगले पोस्ट में लिखूंगी फिलहाल मैं संगीतकार गुलाम मोहम्मद की कर रही हूँ.
चूँकि 10 साल की देरी की वजह से बहुत कुछ बदल चुका था और उन दिनों संगीतकार गुलाम मोहम्मद की तबियत भी नासाज़ सी रहती थी . गुलाम साहब ने अपनी तबियत का हवाला देते हुए नौसाद साहब को कहा कि बचे हुए संगीत और इसकी रिकॉर्डिंग को आप पूरा करवा दे. ‘पाकीज़ा’ के गाने ‘ठाड़े रहियो ओ बाके’ की रिकॉर्डिंग के दौरान तबियत ख़राब होने की वजह से स्टूडियो में गाने रिकॉर्ड किये जा रहे थे , तब गुलाम मोहम्मद साहब रिक्शे में बैठ कर स्टूडियो पहुँच गए और गानों को अपने सामने रिकॉर्ड करवाया.
इसके अलावा कहा जाता है कि ‘यूँ ही कोई मिल गया था सरे राह चलते-चलते’ गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान गुलाम मोहम्मद साहब ने करीब 20 से 21 रिटेक लिए थे. ऐसे में कमाल अमरोही की समझ से ये बात बिलकुल दूर थी कि आखिर गुलाम भाई चाह क्या रहे. लेकिन जिसको अपनी कला से प्यार हो और जो कलाकार को पहचानता हो वो बेहतरी के लिए चुप ही रहता है और कमाल साहब भी ऐसी नज़ाकत को समझते थे .

20 या 21 टेक के बाद जो संगीत और सुरों की मिठास कानों को सुनने को मिली वो असर कुछ आज भी ऐसा है कि आप और हम इस गीत के साथ खुद को जोड़कर गुनगुना जाते है. कुछ गीत जो अधूरे रहे उसे बाद में पूरा किया गया. क्योंकि फ़िल्म 1972 में रिलीज़ हुई और गुलाम मोहम्मद साहब ने 1968 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. इंतकाल के बाद कई लोगों ने कमाल साहब को कहा कि कुछ गाने के संगीत को बदल दिया क्योंकि अब सिनेमा में म्यूजिक का ट्रेंड बदल चुका है. तब तक शंकर-जयकिशन छा चुके थे और दोस्तों ने सुझाव दिया कि बचे हुए गाने का ज़िम्मा इन्हें दे दिया जाए. लेकिन कमाल साहब ने कहा किसी मरे हुए इंसान के साथ ये करना गद्दारी होगी और मैं ये नहीं कर सकता. बाकी गानों को नौशाद ही पूरा करेंगे.
‘पाकीज़ा’ 1972 को पर्दे पर आई और इसके संगीत लोगों के ज़हन में घर कर गयी. लेकिन इस बड़ी कामयाबी को देखने के लिए वो मशहूर सितारा नहीं रहा. जिसने अपनी धुन से एक नये इतिहास के अध्याय को लिखा था. आज भी ‘पाकीज़ा’ के गीत जब कही सुनती हूँ तो लगता है कोई अदृश्य सी शक्ति रूह को छू रही है. ये जुबां उस संगीत के साथ उस जादूगर को याद कर लेती है. कमाल अमरोही की फ़िल्म ने एक नहीं कई सितारों को इस जहान में रोशन किये. आप भी जब इस फ़िल्म के संगीत को सुनें तो महसूस होगा कि इसमें कितना सुकून और ठहराव है. फ़िलहाल किस्से और भी है. वक़्त मिलते ही फिर लिखूंगी क्योंकि ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’. (नंदनी स्वतंत्र लेखक हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
यह भी पढ़ें: पाकीज़ा पार्ट -1: किस्सों की दुनिया में ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म के कुछ अनछुए पहलू
पाकीज़ा पार्ट -2: कैसे पूरा हुआ फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ का संगीत?
नंदनी अग्रवाल
हिंदी सिनेमा के इतिहास में किस्सा उस फिल्म का जिस वक्त सिनेमा हुआ करता था. जी हां बॉलीवुड नहीं हुआ था और ना ही फिल्म इंडस्ट्री कही जाती थी, कहा जाता था तो सिर्फ सिनेमा . ऐसे में महान और फिल्मों के जादूगर जो कैमरे की लैंस से एक नयी इतिहास लिखने को बेचैन थे, सही समझा आपने बात कमाल अमरोही की कर रही हूं. कमाल साहब के नाम में कमाल इसलिए भी होगा शायद उनके वालिद साहब को पता था कि ये एक दिन सच में कमाल करेगा. बात कमाल अमरोही की उस जादूगरी की जो उन्होंने सोची सन् 1955 में थी. जिसे आप और हम फिल्म इतिहास में एक जादू के रूप में मान सकते है. एक ख्वाब जिसे कमाल साहब ने देखा और नाम दिया ‘पाकीज़ा’ .
कमाल साहब उन दिनों अपनी बेगम मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के साथ भारत के दक्षिण में सुकून के दिन गुजार रहे थे. कमाल साहब ने ये सोचा कि जैसे लोग ताजमहल देखकर उसे दो प्यार करने वाले की निशानी के रूप में याद करते है. कुछ ऐसा हो कि सिनेमा में जब भी बात हो तो कमाल-मीना का नाम लोग ताउम्र याद करें . ऐसे में कमाल साहब ये भी चाहते थे कि एक ऐसी फिल्म बने जिससे मीना कुमारी इस सिनेमा जगत में एक स्टार के रूप छा जाएं और भारतीय सिनेमा में महान अदाकारा के नाम से जानी जाएं.
अपने दिल की बात कमाल साहब ने मीना कुमारी को बतायी और मीना जी ने हामी भरी. उसके बाद सन् 1958 में कहानी तो लिखी जा चुकी थी. फिर खोज़ शुरू हुई मशहूर फिल्म ‘पाकीजा’ के दमदार संगीत और गाने को लिखने वाले दिग्गज की . कमाल साहब ने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी और कैफ़ भोपाली से बात की . गीत लिखने के बाद बात संगीत की हुई और गुलाम मोहम्मद साहब को इस ऐतिहासिक फिल्म के लिए कहा गया.

गुलाम मोहम्मद साहब ने बेहतरीन संगीत तो दी लेकिन फिल्म में देरी की वजह से ( देरी के कारण भी आनेवाले पोस्ट में लिखूंगी) तब तक मौत हो चुकी थी. कमाल और मीना कुमारी के बीच रिश्तो की तकरार की वजह से 1958 में शुरू हुई शूटिंग को रोकना पड़ा. फिर ये शूटिंग शुरू 1968 में हुई यानि 10 साल बाद ‘पाकीज़ा’ फिर ‘साउंड,लाइट और एक्शन’ की आवाज़ सुनी. खैर पहले भी बता चुकी हूँ कि देरी की वजह अगले पोस्ट में लिखूंगी फिलहाल मैं संगीतकार गुलाम मोहम्मद की कर रही हूँ.
चूँकि 10 साल की देरी की वजह से बहुत कुछ बदल चुका था और उन दिनों संगीतकार गुलाम मोहम्मद की तबियत भी नासाज़ सी रहती थी . गुलाम साहब ने अपनी तबियत का हवाला देते हुए नौसाद साहब को कहा कि बचे हुए संगीत और इसकी रिकॉर्डिंग को आप पूरा करवा दे. ‘पाकीज़ा’ के गाने ‘ठाड़े रहियो ओ बाके’ की रिकॉर्डिंग के दौरान तबियत ख़राब होने की वजह से स्टूडियो में गाने रिकॉर्ड किये जा रहे थे , तब गुलाम मोहम्मद साहब रिक्शे में बैठ कर स्टूडियो पहुँच गए और गानों को अपने सामने रिकॉर्ड करवाया.
इसके अलावा कहा जाता है कि ‘यूँ ही कोई मिल गया था सरे राह चलते-चलते’ गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान गुलाम मोहम्मद साहब ने करीब 20 से 21 रिटेक लिए थे. ऐसे में कमाल अमरोही की समझ से ये बात बिलकुल दूर थी कि आखिर गुलाम भाई चाह क्या रहे. लेकिन जिसको अपनी कला से प्यार हो और जो कलाकार को पहचानता हो वो बेहतरी के लिए चुप ही रहता है और कमाल साहब भी ऐसी नज़ाकत को समझते थे .

20 या 21 टेक के बाद जो संगीत और सुरों की मिठास कानों को सुनने को मिली वो असर कुछ आज भी ऐसा है कि आप और हम इस गीत के साथ खुद को जोड़कर गुनगुना जाते है. कुछ गीत जो अधूरे रहे उसे बाद में पूरा किया गया. क्योंकि फ़िल्म 1972 में रिलीज़ हुई और गुलाम मोहम्मद साहब ने 1968 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. इंतकाल के बाद कई लोगों ने कमाल साहब को कहा कि कुछ गाने के संगीत को बदल दिया क्योंकि अब सिनेमा में म्यूजिक का ट्रेंड बदल चुका है. तब तक शंकर-जयकिशन छा चुके थे और दोस्तों ने सुझाव दिया कि बचे हुए गाने का ज़िम्मा इन्हें दे दिया जाए. लेकिन कमाल साहब ने कहा किसी मरे हुए इंसान के साथ ये करना गद्दारी होगी और मैं ये नहीं कर सकता. बाकी गानों को नौशाद ही पूरा करेंगे.
‘पाकीज़ा’ 1972 को पर्दे पर आई और इसके संगीत लोगों के ज़हन में घर कर गयी. लेकिन इस बड़ी कामयाबी को देखने के लिए वो मशहूर सितारा नहीं रहा. जिसने अपनी धुन से एक नये इतिहास के अध्याय को लिखा था. आज भी ‘पाकीज़ा’ के गीत जब कही सुनती हूँ तो लगता है कोई अदृश्य सी शक्ति रूह को छू रही है. ये जुबां उस संगीत के साथ उस जादूगर को याद कर लेती है. कमाल अमरोही की फ़िल्म ने एक नहीं कई सितारों को इस जहान में रोशन किये. आप भी जब इस फ़िल्म के संगीत को सुनें तो महसूस होगा कि इसमें कितना सुकून और ठहराव है. फ़िलहाल किस्से और भी है. वक़्त मिलते ही फिर लिखूंगी क्योंकि ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’. (नंदनी स्वतंत्र लेखक हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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