Opinion: कोरोना काल मे जीना-मरना दोनों कठिन
अजय पांडेय
कोरोना काल का संकट भी अजीब है ना जीने दे रहा है और नाही शकून से मरने. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में कोरोना बहुत भीषण रूप में तो नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में जिस रफ्तार से बढ़ रहा है वह सरकार के लिए चिंता का विषय जरूर बनता जा रहा है पहले माना जा रहा था कि मई-जून की गर्मी शुरू होते ही कोरोना हमारे जीवन से दूर चला जाएगा, लेकिन ज्यों-ज्यों गर्मी गर्मी बढ़ती जा रही है कोरोना और तेज रफ्तार में आगे की तरफ बढ़ता चला जा रहा है देश के कई बड़े शहरों में विदेशों की तरह पूरा का पूरा शहर प्रभावित होता चला जा रहा है.
आजादी के इतने दिनों बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी खस्ताहाल है.जिसका अंदाजा नहीं था, जो लोग स्वश्थ है उनको अपने और अपने परिवार के निवाले की चिन्ता खाये जा रही है. महामारी के डर से लोगों का जीवन घरों में कैद रहने को मजबूर हैं ,लोग भयग्रस्त होकर मास्क, समाजिक दूरी को सुरक्षा का आधार मान कर जीवन जी रहे है, लोग रोजगार, भूख,भय आदि समस्याओ से जूझ रहे हैं. और जो कोरोना संक्रमित है उनके ऊपर तो मानो बज्रपात ही हो गया है दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मरीजों के लिए बिस्तर कम पड़ते जा रहे हैं और जो लोग जिन्दगी से जंग हार गए उनके अंतिम संस्कार के लिए जगह भी कम पड़ती जा रही है. ज्यादे शुल्क होने से लोग जांच से भी कतरा रहे हैं कोरोना संक्रमित होने की हालत में जो लोग घर में अस्पतालों में कैद हैं वह डरते हैं कि कहीं किसी को यह पता ना चल जाए कि मैं कोरोना का मरीज हूं,यहां तक की मरीज के परिवार के लोग भी उससे दूरी बना लेते हैं और जो जीवन की जंग हार जाते हैं उनके घर वाले भी उनके शव को उठाने और अंतिम संस्कार मे श्मशान घाट या कब्रिस्तान में कतारों में खड़े होने से भी कतराते हैं यह हालत देखकर मिर्जा गालिब एक शेर याद आता है.
हुए मरके हम जो रुस्वा, हुए क्यों न गर्के-दरिया .
ना कभी जनाजा उठता, ना कहीं मजार होता ..
इस कोरोना काल संकट के समय मे भी हमारे देश के नेता लोग एक दूसरे का सहयोग करने के बजाए एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हुए हैं ऐसा लगता है कि उनके दिल में दया कम, सत्ता की भूख ज्यादा है. यही हाल हमारे अस्पतालों का है. इसमें कोई शक नहीं नहीं कि अधिकांश डॉक्टर और नर्सें अपनी जान पर खेल कर लोगों की सेवा कर रही हैं लेकिन कुछ एक अपवादों को छोड़कर इस संकट के दौर में सारे अस्पताल मरीजों से पैसा चूसने में लगे हुए हैं सिर्फ जांच के नाम पर मरीजों की खून पसीने से कमाई एक महीने की वेतन ले लेते हैं अगर उसे भर्ती होना पड़े तो इलाज के खर्च की राशि सुनकर ही उसका दम निकल जाएगा.
मैं तो कहता हूं कि प्रत्येक कोरोना मरीज़ का इलाज मुफ्त होना चाहिए. दुनिया में सबसे जल्दी ठीक होने वाले मरीज भारत में ही हैं जिनमें गरीब मरीजों की संख्या अधिक है उन पर खर्च कितना होगा ? सरकार हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रही है? यह जनता के सामने एक यक्ष-प्रश्न बना हुआ है सरकार को सारे मरीजों की जांच निशुल्क करानी चाहिए जिससे इलाज के नाम पर हो रही लूटपाट बंद हो. जांच, दवा, कमरा और पूरे इलाज की राशि पर नियंत्रण लगा दे. तथा एक निश्चित राशि तय कर दे. राशि इतनी कम भी नहो कि गैर-सरकारी अस्पतालो का दम घूटने लगे लेकिन लेकिन वे मरीजों का दम न घोटें, सरकार को इस विषय पर भी ध्यान देना चाहिए. (यह लेखक की निजी विचार हैं.)
Opinion: कोरोना काल मे जीना-मरना दोनों कठिन
अजय पांडेय
कोरोना काल का संकट भी अजीब है ना जीने दे रहा है और नाही शकून से मरने. दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में कोरोना बहुत भीषण रूप में तो नहीं है, लेकिन वर्तमान समय में जिस रफ्तार से बढ़ रहा है वह सरकार के लिए चिंता का विषय जरूर बनता जा रहा है पहले माना जा रहा था कि मई-जून की गर्मी शुरू होते ही कोरोना हमारे जीवन से दूर चला जाएगा, लेकिन ज्यों-ज्यों गर्मी गर्मी बढ़ती जा रही है कोरोना और तेज रफ्तार में आगे की तरफ बढ़ता चला जा रहा है देश के कई बड़े शहरों में विदेशों की तरह पूरा का पूरा शहर प्रभावित होता चला जा रहा है.
आजादी के इतने दिनों बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी खस्ताहाल है.जिसका अंदाजा नहीं था, जो लोग स्वश्थ है उनको अपने और अपने परिवार के निवाले की चिन्ता खाये जा रही है. महामारी के डर से लोगों का जीवन घरों में कैद रहने को मजबूर हैं ,लोग भयग्रस्त होकर मास्क, समाजिक दूरी को सुरक्षा का आधार मान कर जीवन जी रहे है, लोग रोजगार, भूख,भय आदि समस्याओ से जूझ रहे हैं. और जो कोरोना संक्रमित है उनके ऊपर तो मानो बज्रपात ही हो गया है दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मरीजों के लिए बिस्तर कम पड़ते जा रहे हैं और जो लोग जिन्दगी से जंग हार गए उनके अंतिम संस्कार के लिए जगह भी कम पड़ती जा रही है. ज्यादे शुल्क होने से लोग जांच से भी कतरा रहे हैं कोरोना संक्रमित होने की हालत में जो लोग घर में अस्पतालों में कैद हैं वह डरते हैं कि कहीं किसी को यह पता ना चल जाए कि मैं कोरोना का मरीज हूं,यहां तक की मरीज के परिवार के लोग भी उससे दूरी बना लेते हैं और जो जीवन की जंग हार जाते हैं उनके घर वाले भी उनके शव को उठाने और अंतिम संस्कार मे श्मशान घाट या कब्रिस्तान में कतारों में खड़े होने से भी कतराते हैं यह हालत देखकर मिर्जा गालिब एक शेर याद आता है.
हुए मरके हम जो रुस्वा, हुए क्यों न गर्के-दरिया .
ना कभी जनाजा उठता, ना कहीं मजार होता ..
इस कोरोना काल संकट के समय मे भी हमारे देश के नेता लोग एक दूसरे का सहयोग करने के बजाए एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हुए हैं ऐसा लगता है कि उनके दिल में दया कम, सत्ता की भूख ज्यादा है. यही हाल हमारे अस्पतालों का है. इसमें कोई शक नहीं नहीं कि अधिकांश डॉक्टर और नर्सें अपनी जान पर खेल कर लोगों की सेवा कर रही हैं लेकिन कुछ एक अपवादों को छोड़कर इस संकट के दौर में सारे अस्पताल मरीजों से पैसा चूसने में लगे हुए हैं सिर्फ जांच के नाम पर मरीजों की खून पसीने से कमाई एक महीने की वेतन ले लेते हैं अगर उसे भर्ती होना पड़े तो इलाज के खर्च की राशि सुनकर ही उसका दम निकल जाएगा.
मैं तो कहता हूं कि प्रत्येक कोरोना मरीज़ का इलाज मुफ्त होना चाहिए. दुनिया में सबसे जल्दी ठीक होने वाले मरीज भारत में ही हैं जिनमें गरीब मरीजों की संख्या अधिक है उन पर खर्च कितना होगा ? सरकार हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रही है? यह जनता के सामने एक यक्ष-प्रश्न बना हुआ है सरकार को सारे मरीजों की जांच निशुल्क करानी चाहिए जिससे इलाज के नाम पर हो रही लूटपाट बंद हो. जांच, दवा, कमरा और पूरे इलाज की राशि पर नियंत्रण लगा दे. तथा एक निश्चित राशि तय कर दे. राशि इतनी कम भी नहो कि गैर-सरकारी अस्पतालो का दम घूटने लगे लेकिन लेकिन वे मरीजों का दम न घोटें, सरकार को इस विषय पर भी ध्यान देना चाहिए. (यह लेखक की निजी विचार हैं.)
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