प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनौतियां पुरानी, टीम नयी

-डॉ. श्रीनाथ सहाय
आखिरकर मोदी मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार और फेरबदल हो ही गया. प्रधानमंत्री मोदी की दूसरी पारी का ये पहला मंत्रिमंडल विस्तार है और ये एक तरीके से मंत्री बने बीजेपी नेताओं के अप्रेजल जैसा लगता है, और साथ में नये मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के लिए सख्त मैसेज भी है. घटक दलों जनता दल यूनाइटेड, लोक जनशक्ति पार्टी और अपना दल को मंत्रिमंडल में जगह देकर राजग की सहभागिता की सार्थकता को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है, जो चुनावी रणनीति की भी जरूरत थी. वहीं जातीय समीकरणों को साधकर समरसता का संदेश दिया गया तो मंत्रिमंडल में ग्यारह महिलाओं को शामिल करके लैंगिक समानता का निष्कर्ष देने का प्रयास किया गया. दूसरी ओर युवा चेहरों को शामिल करके मंत्रिमंडल को ऊर्जावान दर्शाने का प्रयास किया गया. मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मंत्रियों की औसत आयु साठ से कम हो गई, वहीं चैदह मंत्री पचास साल से कम उम्र के हैं.
मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे आशचर्यजनक तो रविशंकर प्रसाद का आईटी मिनिस्टर के पद से इस्तीफा रहा जबकि कोविड 19 के पहले राजनीतिक शिकार डॉक्टर हर्षवर्धन हुए हैं. अनुराग ठाकुर जैसे मंत्रियों का ओहदा बढ़ाया जाना जहां उनकी उपलब्धियों पर मुहर है, वहीं यूपी से अनुप्रिया पटेल, बिहार से पशुपति कुमार पारस और महाराष्ट्र से नारायण राणे को केंद्रीय कैबिनेट का हिस्सा बनाना एडजस्ट करने के साथ ही केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की तरफ से एक बड़ा राजनीतिक बयान भी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के दो साल बीत जाने के बाद मंत्रीमंडल का जो विस्तार किया वह राजनीतिक से ज्यादा पेशेवर कार्यशैली का आभास कराता है. दो साल की समीक्षा के बाद एक दर्जन मंत्रियों को एक झटके में हटा देना साहसिक निर्णय है. खास तौर पर रविशंकर प्रसाद , प्रकाश जावडेकर ,रमेश पोखरियाल , संतोष गंगवार और डा हर्षवर्धन को हटाना आसान नहीं था. लेकिन जैसी खबरें आ रही थीं उनके अनुसार प्रधानमंत्री बीते एक महीने से सभी मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा कर रहे थे. कोरोना काल में सरकार का काम अनेक क्षेत्रों में न सिर्फ पिछड़ा अपितु उसके माथे विफलता का दाग भी लगने लगा था. बंगाल चुनाव के बाद मंत्रीमंडल का पुनर्गठन और मंत्रियों के विभागों में फेरबदल अपेक्षित भी था और आवश्यक भी. उस दृष्टि से श्री मोदी ने जो किया वह स्वाभाविक प्रक्रिया ही है.
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बहरहाल नए मंत्रियों के चयन और पुरानों के विभागों में बदलाव से ये बात समझ में आती है कि प्रधानमन्त्री ने केवल उप्र ही नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव की व्यूहरचना भी दिमाग में रखी है. उप्र को 16 मंत्री देने के साथ ही उन्होंने बंगाल और महाराष्ट्र पर भी विशेष ध्यान दिया जो दूरगामी रणनीति का संकेत है. सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि श्री मोदी ने राजनीतिक और जातीय समीकरण साधे रखने के साथ ही चतुराई से मंत्रीमंडल में शैक्षणिक और पेशेवर और गुणवत्ता तथा अनुभव को महत्व देते हुए ऐसे चेहरों को सत्ता संचालन में अपना सहयोगी बनाया जो राजनीतिक दृष्टि से भले ही प्रभावशाली नजर न आते हों लेकिन जो मंत्रालय उनको दिया गया उसका दायित्व निर्वहन करने में सफल होगे.
इसका कारण ये है कि दूसरी पारी का 40 फीसदी कार्यकाल व्यतीत होने के बाद भी केंद्र सरकार जनमानस पर वैसा असर नहीं छोड़ पा रही जिसके लिए श्री मोदी जाने जाते हैं. ये बात सच है कि कोरोना ने सरकार के कामकाज पर बुरा असर डाला. महंगाई विशेष रूप से पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने कट्टर मोदी समर्थको तक को नारज कर दिया है. ब्रांड मोदी के चलते भाजपा जिस तरह से निश्चित होकर बैठी थी वह स्थिति काफी बदल चुकी है.
बंगाल चुनाव में हालाँकि कांग्रेस और वामदलों के सफाए ने पार्टी के लिए नई सम्भवनाओं के दरवाजे खोल दिए हैं लकिन राष्ट्रीय विकल्प की गैर मौजूदगी को विजय की स्थायी गारंटी नहीं माना जा सकता और ये बात श्री मोदी अच्छी तरह समझते हैं. विपरीत परिस्थितियों में चुनौतियों पर विजय हासिल करने में वे काफी पारंगत हैं. लेकिन ये भी सही है कि आत्मविश्वास का अतिरेक अप्रत्याशित पराजय का कारण बन जाता है. 2004 में स्व. अटलबिहारी वाजपेयी अच्छी छवि के बाद भी स्व. प्रमोद महाजन के अति आत्मविश्वास की वजह से सत्ता गँवा बैठे थे. श्री मोदी उस अनुभव से बचने के प्रति सदैव सतर्क रहते हैं और यही गत दिवस हुए मंत्रीमंडल विस्तार में झलकता है. जहां तक बात आगामी लोकसभा चुनाव की है तो उनको पता है कि 2022 में होने वाले राज्यों के चुनावों में भले ही भाजपा बाकी राज्यों में ज्यादा कुछ न कर पाए लेकिन उप्र और गुजरात में उसे सत्ता हासिल करने के साथ ही बड़ा बहुमत लाना होगा क्योंकि उप्र जहां राष्ट्रीय राजनीति में दबदबे के लिए जरूरी है वहीं गुजरात से प्रधानमन्त्री की साख जुडी हुई है.
इस प्रकार प्रधानमन्त्री ने बड़ी ही चतुराई से मंत्रीमंडल की संरचना की है. उनको ये बात अच्छी तरह पता है कि मंत्रियों के चेहरे और प्रभाव से ज्यादा लोग सरकार के कामकाज से अपनी राय बनायेंगे और उस दृष्टि से श्री मोदी के पास समय कम और काम ज्यादा है. शपथ ग्रहण के फौरन बाद विभागों का ऐलान दर्शाता है कि प्रधानमन्त्री ने भविष्य का पूरा तानाबाना बुन लिया है. और इसीलिये उम्मीद की जा सकती है कि अब सरकार तेजी से काम करेगी. लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि आर्थिक मोर्चे पर उसका प्रदर्शन कैसा रहेगा क्योंकि आगामी राजनीतिक मुकाबलों में महंगाई और कारोबारी जगत के सामने आ रही परेशानियां ही फैसले का आधार बनेंगे. कह सकते हैं कि एक तीर से कई निशाने साधे गये हैं. सरकार जानती है कि 2024 के संसदीय चुनाव जीतने के लिये पार्टी को उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बढ़त लेनी होगी. हाल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सारे संसाधन झोंकने के बाद मिली हार के सबक भी पार्टी के सामने होंगे. यह वजह है कि यह जम्बो मंत्रिमंडल सामने आया और बारह बहुचर्चित मंत्रियों को हटाया गया. बताते हैं कि जून में सभी मंत्रालयों की समीक्षा करने के बाद मंत्रियों को हटाने और प्रोन्नत करने की रणनीति बनी थी. -लेखक राज्य मुख्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश में मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.