मोदी सरकार के दावे फेल! बस्ती में किसानों को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ

मोदी सरकार के दावे फेल! बस्ती में किसानों को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ
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 -जितेन्द्र कौशल सिंह-

बस्ती। (Basti News) मोदी सरकार (Modi Government)किसानों (Farmers In India) की आय दोगुनी करने के दावे कर रही है और धरातल पर किसान समय से जूझते परिस्थितियो से लडते हुए अपनी किस्मत खुद गढ़ रहे है। इन खोखले सरकारी दावो के बीच किसान की हालत किसी से छुपी नही है।फसल बीमा से लगायत किसानो को मिलने वाली सब्सिडी पर कषि एवं उद्यान विभाग के चहेते किसानो लाभ दिला कर जिम्मेदार भले ही खुद की पीठ थपथपा लेकिन उनको मिलने वाली सुविधाये उन तक पहुचने सिफारस घूस की सीढी अब भी लगानी पड रही। लेकिन किसान प्रकुति परिस्थितियो से दो दो हाथ कर अनुदान सम्मान का मोह त्याग खुद की किस्मत सवारने में जी जान से लगे है और एक मिशाल कायम कर रहे है।

सरकारी अनुदान की बाट जोहने के बजाय खुद की मेहनत के बल खेती मे नये प्रयोग करने बाले अशोक कुमार त्रिपाठी भी ऐसे ही किसानो में एक है। हर्रैया नगर पंचायत के अम्बेडकर नगर वार्ड के रहने वाले अशोक कुमार त्रिपाठी की लगभग बीस बीघा जमीन पूरी तरह बलुई थी। ऐसी जमीन से खरीफ की फसल लेना संभव नही थंा। ऐसे हाल मे खेत ज्यादातर समय केवल रेत उडती थी। उन्हाने इस खेत से बेहतर लाभ लेने के लिए कई कषि संस्थानो एवं विशेषज्ञो से सम्पर्क कर जानकारी हासिल किया। इसी बीच उनके उनके एक मित्र ने जो पास के ही गांव भदावल के रहने वाले थे उन्हाने केले की उन्नतशील प्रजाति की खेती कर कम लागत मे बेहतर मुनाफा कमाने मिलने की बात कही यह बात अशोक कुमार त्रिपाठी के मन में बैठ गई। उन्हाने इसके लिए जरूरी जानकारी हासिल कर अपनी बीस बीघा जमीन के लिए महाराष्ट के जलगांव से 6200 पौधे रोपण के मगाया। खेतो की बेहतर जताई कराकर उसमे गोबर की खाद एवं फसल को कीटो ,दीमक से बचाने के लिए कीटनाशक मिलाकर खेत की बेहतर तैयारी किया। पौधो की रोपाई के बाद उन्हाने विशेषज्ञो के सुझाव के अनुसार खाद एवं कीटनाशक का उपयोग करना शुरू किया।

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जनपद मे उद्यान विभाग द्वारा किसानो को सब्सिडी मिलनी थी। जिसमे अशोक कुमार त्रिपाठी का नाम भी शामिल था। लेकिन बीते मार्च तक जब सब्सिडी उनके खाते में नही आयी तो उन्हाने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत किया,  तो पोर्टल पर निर्धारित समय मे जबाब आया कि आपके मामले का निस्तारण कर दिया गया है। लेकिन उसके बाद भी खाते में पैसा नही आया। विभागीय अधिकारियो से कई बार बात करने के बावजूद भी अब तक खाते में एक भी रूपया नही पहुचा।आश्वासन यह कि किन्ही कारणो अब तक पैसा नही पहुच पाया। अगले सत्र में पैसा खाते में पैसा भेज दिया जायेगा।

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बेहतर जमीन की तैयार से फसल को बीमारी से बचाने मे मिली सफलता एवं उचित देखभाल से कुछ ही फसल तेजी से विकास करने लगी। ठंड का मौसम आते ही फसल मे अचानक किसी घातक रोग का प्रभाव हो गया।अचानक केले की पत्तिया गलने लगी।उन्हे लगा कि अब तक की मेहनत लागत दोनो से हाथ धोना पड जायेगा। लेकिन उन्हाने हार नही मानी। वह दुगने जोश से उसे ठीक करने मे लग गये इसके लिए उन्होने कृषि कई विशेषज्ञो से राय लेत हुए अपनी फसल को बचाने का भरपूर कोशिश शुरू कर दी।विशेषज्ञो के बताये अनुसार उन्हाने केले की फसल में कापर आक्सीक्लोराट एवं हमला नामक दवाओ का प्रयोग करना शुरू किया। लगातार फसल की निगरानी एवं इन दवाओ के प्रयोग से फसल में रोग का प्रभाव धीरे धीरे कम होना शुरू हो गया। उनकी इसी सक्रियता एवं मेहनत के दम पर वह फसल पूरी तरह से रोग मुक्त हो गई।

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अशोक कुमार त्रिपाठी बताते है कि फसल में तकनीकि प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक का प्रयोग बहुत मायने रखता है।इस पर उन्होने विशेष ध्यान दिया। बताते है कि फसल मे अब तक 6 बार खाद दे चुके है। जिसमे वह डीएपी, यूरिया,पोटाश, सिंगल सुपर फास्फेट, माइक्रो न्यूटियन्स एव सागरिका का प्रयोग प्रति पौधे में 250 ग्राम के हिसाब से करते है।

केले की फसल में लागत को लेकर वह कहते है कि इस फसल को छोटे किसान भी लगा कर बेहतर मुनाफा कमा सकते है। जिससे उनकी माली हालत तो बेहतर होगी ही वह दुसरो को भी एक रास्ता दिखा पायेगें। उनके अनुसार एक बीघे खेत मे लगभग पच्चीस से तीस हजार की लागत आती है। जिससे किसान को लगभग एक लाख रूपये की शुद्ध आमदनी की सम्भावना रहती है। यदि फसल की बेहतर देखभाल की जाय तो केले के एक घार का वजन 25 से तीस किलो के आस पास होगा। इसी बीच फसल रोपाई के बाद ही सूअर ,शाही, नीलगाय ने नुकसान पहुचाना शुरू कर दिया।तब फसल की सुरक्षा को के लेकर उन्हाने पहले प्लाटिक जाली लगाई लेकिन इसका कोई खास लाभ नही मिला।तब उन्होने मजबूत सुरक्षा बाड लगाने का निश्चय किया।उन्हाने कटीले तारो वाली जाली से पूरे खेत की फेन्सिंग कराई। जिससे आज उनकी केले की फसल पूरी तरह से सुरक्षित है। उनका कहना है कि यदि किसान पारम्परिक खेती से हटकर नकछी फसलो की ओर ध्यान दे तो उनकी आय सुधर सकती है।
विशेषज्ञो से सलाह लेकर यदि बेहतर ढ़ग से खेती की जाय तो लागत मे तो कमी आयेगी ही बल्कि मार्केटिंग एवं मूल्य निर्धारण की समस्या से निजात मिलेगी।क्योकि केले की फसल के लोकल खरीददार खेतो तक ,खुद पहुचकर खरीददारी करते रहते है।

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bhartiyabasti.com
23 Aug 2019 By Bhartiya Basti

मोदी सरकार के दावे फेल! बस्ती में किसानों को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ

 -जितेन्द्र कौशल सिंह-

बस्ती। (Basti News) मोदी सरकार (Modi Government)किसानों (Farmers In India) की आय दोगुनी करने के दावे कर रही है और धरातल पर किसान समय से जूझते परिस्थितियो से लडते हुए अपनी किस्मत खुद गढ़ रहे है। इन खोखले सरकारी दावो के बीच किसान की हालत किसी से छुपी नही है।फसल बीमा से लगायत किसानो को मिलने वाली सब्सिडी पर कषि एवं उद्यान विभाग के चहेते किसानो लाभ दिला कर जिम्मेदार भले ही खुद की पीठ थपथपा लेकिन उनको मिलने वाली सुविधाये उन तक पहुचने सिफारस घूस की सीढी अब भी लगानी पड रही। लेकिन किसान प्रकुति परिस्थितियो से दो दो हाथ कर अनुदान सम्मान का मोह त्याग खुद की किस्मत सवारने में जी जान से लगे है और एक मिशाल कायम कर रहे है।

सरकारी अनुदान की बाट जोहने के बजाय खुद की मेहनत के बल खेती मे नये प्रयोग करने बाले अशोक कुमार त्रिपाठी भी ऐसे ही किसानो में एक है। हर्रैया नगर पंचायत के अम्बेडकर नगर वार्ड के रहने वाले अशोक कुमार त्रिपाठी की लगभग बीस बीघा जमीन पूरी तरह बलुई थी। ऐसी जमीन से खरीफ की फसल लेना संभव नही थंा। ऐसे हाल मे खेत ज्यादातर समय केवल रेत उडती थी। उन्हाने इस खेत से बेहतर लाभ लेने के लिए कई कषि संस्थानो एवं विशेषज्ञो से सम्पर्क कर जानकारी हासिल किया। इसी बीच उनके उनके एक मित्र ने जो पास के ही गांव भदावल के रहने वाले थे उन्हाने केले की उन्नतशील प्रजाति की खेती कर कम लागत मे बेहतर मुनाफा कमाने मिलने की बात कही यह बात अशोक कुमार त्रिपाठी के मन में बैठ गई। उन्हाने इसके लिए जरूरी जानकारी हासिल कर अपनी बीस बीघा जमीन के लिए महाराष्ट के जलगांव से 6200 पौधे रोपण के मगाया। खेतो की बेहतर जताई कराकर उसमे गोबर की खाद एवं फसल को कीटो ,दीमक से बचाने के लिए कीटनाशक मिलाकर खेत की बेहतर तैयारी किया। पौधो की रोपाई के बाद उन्हाने विशेषज्ञो के सुझाव के अनुसार खाद एवं कीटनाशक का उपयोग करना शुरू किया।

जनपद मे उद्यान विभाग द्वारा किसानो को सब्सिडी मिलनी थी। जिसमे अशोक कुमार त्रिपाठी का नाम भी शामिल था। लेकिन बीते मार्च तक जब सब्सिडी उनके खाते में नही आयी तो उन्हाने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत किया,  तो पोर्टल पर निर्धारित समय मे जबाब आया कि आपके मामले का निस्तारण कर दिया गया है। लेकिन उसके बाद भी खाते में पैसा नही आया। विभागीय अधिकारियो से कई बार बात करने के बावजूद भी अब तक खाते में एक भी रूपया नही पहुचा।आश्वासन यह कि किन्ही कारणो अब तक पैसा नही पहुच पाया। अगले सत्र में पैसा खाते में पैसा भेज दिया जायेगा।

बेहतर जमीन की तैयार से फसल को बीमारी से बचाने मे मिली सफलता एवं उचित देखभाल से कुछ ही फसल तेजी से विकास करने लगी। ठंड का मौसम आते ही फसल मे अचानक किसी घातक रोग का प्रभाव हो गया।अचानक केले की पत्तिया गलने लगी।उन्हे लगा कि अब तक की मेहनत लागत दोनो से हाथ धोना पड जायेगा। लेकिन उन्हाने हार नही मानी। वह दुगने जोश से उसे ठीक करने मे लग गये इसके लिए उन्होने कृषि कई विशेषज्ञो से राय लेत हुए अपनी फसल को बचाने का भरपूर कोशिश शुरू कर दी।विशेषज्ञो के बताये अनुसार उन्हाने केले की फसल में कापर आक्सीक्लोराट एवं हमला नामक दवाओ का प्रयोग करना शुरू किया। लगातार फसल की निगरानी एवं इन दवाओ के प्रयोग से फसल में रोग का प्रभाव धीरे धीरे कम होना शुरू हो गया। उनकी इसी सक्रियता एवं मेहनत के दम पर वह फसल पूरी तरह से रोग मुक्त हो गई।

अशोक कुमार त्रिपाठी बताते है कि फसल में तकनीकि प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक का प्रयोग बहुत मायने रखता है।इस पर उन्होने विशेष ध्यान दिया। बताते है कि फसल मे अब तक 6 बार खाद दे चुके है। जिसमे वह डीएपी, यूरिया,पोटाश, सिंगल सुपर फास्फेट, माइक्रो न्यूटियन्स एव सागरिका का प्रयोग प्रति पौधे में 250 ग्राम के हिसाब से करते है।

केले की फसल में लागत को लेकर वह कहते है कि इस फसल को छोटे किसान भी लगा कर बेहतर मुनाफा कमा सकते है। जिससे उनकी माली हालत तो बेहतर होगी ही वह दुसरो को भी एक रास्ता दिखा पायेगें। उनके अनुसार एक बीघे खेत मे लगभग पच्चीस से तीस हजार की लागत आती है। जिससे किसान को लगभग एक लाख रूपये की शुद्ध आमदनी की सम्भावना रहती है। यदि फसल की बेहतर देखभाल की जाय तो केले के एक घार का वजन 25 से तीस किलो के आस पास होगा। इसी बीच फसल रोपाई के बाद ही सूअर ,शाही, नीलगाय ने नुकसान पहुचाना शुरू कर दिया।तब फसल की सुरक्षा को के लेकर उन्हाने पहले प्लाटिक जाली लगाई लेकिन इसका कोई खास लाभ नही मिला।तब उन्होने मजबूत सुरक्षा बाड लगाने का निश्चय किया।उन्हाने कटीले तारो वाली जाली से पूरे खेत की फेन्सिंग कराई। जिससे आज उनकी केले की फसल पूरी तरह से सुरक्षित है। उनका कहना है कि यदि किसान पारम्परिक खेती से हटकर नकछी फसलो की ओर ध्यान दे तो उनकी आय सुधर सकती है।
विशेषज्ञो से सलाह लेकर यदि बेहतर ढ़ग से खेती की जाय तो लागत मे तो कमी आयेगी ही बल्कि मार्केटिंग एवं मूल्य निर्धारण की समस्या से निजात मिलेगी।क्योकि केले की फसल के लोकल खरीददार खेतो तक ,खुद पहुचकर खरीददारी करते रहते है।

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