भ्रष्ट अधिकारियों-नेताओं ने मजदूरों की मेहनत की कमाई भी नहीं छोड़ी…. हड़प गए

भ्रष्ट अधिकारियों-नेताओं ने मजदूरों की मेहनत की कमाई भी नहीं छोड़ी…. हड़प गए
Mukhtar Abbas Naqvi1 1

-अजय पांडेय-
19वीं शताब्दी से ही श्रमिकों की समस्या के समाधान हेतु विधान बनाए जा रहे है लेकिन आज तक देश दुनिया मे पूँजीपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण नहीं रुक रहा है आखिर पूंजीपति श्रमिक का कब तक शोषण करते रहेगे राष्ट्रव्यापी हड़तालो के दौरान श्रमिकों का गुस्सा सरकार और पूंजीपति लोगों के खिलाफ जमकर फूटा लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है. हर जगह श्रमिकों का भारी शोषण हो रहा है. गरीबी,भूखमरी, बेकारी, बेरोजगारी और दिनोंदिन आसमान को छूती महंगाई ने श्रमिकों की कमर तोड़कर रख दी है. पूंजीपति लोग श्रमिकों का खून चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. श्रमिकों की बेबसी, लाचारी और नाजुक हालातों का पूंजीपति लोग बड़ी निर्दयता से फायदा उठाते हैं. औद्योगिक इकाईयों में श्रमिकों को मालिकों के हर अत्याचार और शोषण को सहन करने को विवश होना पड़ रहा है.

दिनरात कमर तोड़ मेहनत करने के बावजूद उसे दो वक्त की रोटी भी सही ढ़ंग से नसीब नहीं हो पा रही है. श्रमिकों को देशभर में कहीं भी उनकीं मजदूरी का उचित वेतन नहीं मिल रहा है. कई जगह बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों, कारखानों और औद्योगिक इकाईयों में तो श्रमिकों से अधिक वेतन पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं और ऐतराज जताने पर उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक दिया जाता है. ऐसे में बेबस श्रमिकों को मालिकों के हाथों आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार होने को विवश होना पड़ता है. श्रमिक न तो काम छोड़ सकते हैं और न उस काम की आय से रोजी रोटी चल पाती है. कोई इस बेचारो की बेबसी का अनुमान क्यों नहीं लगा रहा है? श्रमिकों को अगर उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलेगा और उनके हितों का ध्यान नहीं दिया जाएगा तो सरकार को विकट स्थिति का सामना करना ही पड़ेगा. कांग्रेस सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा में भी मजदूरों का जमकर शोषण हो रहा है.

भ्रष्टाचारी अधिकारियों और नेताओं ने उनके श्रम की राशि को हड़पने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. मजदूरों का फर्जी पंजीकरण, मृतकों के नाम मनरेगा के लाभार्थियों दर्शाकर बड़ी राशि का भुगतान, मजदूरों को लंबे समय तक मजदूरी का भूगतान न करने, मजदूरों को बैंक से मनरेगा की राशि निकालकर आधी राशि लौटाने जैसे अनेक ऐसे हथकण्डे देशभर में चल रहे हैं. इसके बावजूद सरकार मनरेगा के नाम पर अपनी पीठ जोर-जोर से थपथपाते नहीं थकते

एक छोटे से छोटे क्लर्क (बाबू) के यहां भी करोड़ रूपये आसानी से मिल जाते हैं. लेकिन, एक आम आदमी के यहां पेटभर खाना भी नहीं है. सांसदों और विधायकों के करोड़ों-अरबों की तो बात ही छोड़िये. देशभर में कई लाख करोड़ रूपये घोटालों और भ्रष्टाचार के अलावा कई लाख करोड़ रूपये काले धन के रूप में जमा हो चुका है. खेती-किसानी करके पेट भरने वाले लोग भूखे मर रहे हैं और बढ़ते कर्ज से परेशान होकर मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो रहे हैं. खेतीहर मजदूर के पास तो जीने की मूलभूत चीजें रोटी-कपड़ा और मकान आजादी के इतने दिनों बाद भी नशीब नही हो रहा है.

एक श्रमिक दिन रात जीजान से मेहनत करने के बावजूद दो वक्त की रोटी कपडा दो बच्चों की शिक्षा का खर्च भी वहन नहीं कर पाता. कमाल की बात तो यह है कि सरकार गरीबी के अजीबो-गरीब आंकड़े देकर बेबस श्रमिकों के जले पर नमक छिड़कने से बाज नहीं आ रही है. कितनी बड़ी विडम्बना है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी मात्र 20 रूपये प्रतिदिन में गुजारा करने को विवश है. ऐसे में एक गरीब आदमी सड़कों पर आकर अपनी बेबसी के आंसू नहीं रोएगा तो और क्या करेगा?

निरन्तर सरकार की भ्रष्टाचारी नीतियों के खिलाफ आक्रोश बढ़ता चला जा रहा है. सरकार गरीबों की आवाज को निर्दयता से दबाने से कतई बाज नहीं आ रही है. इससे बडी विडम्बना क्या होगी कि न्याय पाने के लिए श्रमिक लोग धरना-प्रदर्शन के माध्यम से सड़कों पर उतरकर अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए विवश हैं और सरकार श्रमिकों के आन्दोलन को कोई और ही रूप देने की जुगत में लगी हुई है. आखिर श्रमिकों ने जब-जब सड़क पर उतरकर सत्ता की भ्रष्ट नीतियों और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया है, तब-तब उनके हालातों में सुधार हुआ है.

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लड़ने एवं अपने अधिकारों को पाने और उनकी सुरक्षा करने के लिए मजदूरों को जागरूक एवं संगठित करने का बहुत बड़ा श्रेय कार्ल मार्क्स को जाता है. मार्क्स चाहते थे कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित हो, जिसमें लोगों को आर्थिक समानता का अधिकार और सामाजिक न्याय मिले. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को कार्ल मार्क्स समाज व श्रमिक दोनों के लिए अभिशाप मानते थे.

वे तो हिंसा का सहारा लेकर पूंजीवाद के विरूद्ध लड़ने का भी समर्थन करते थे. इस संघर्ष के दौरान उनकीं प्रमुख चेतावनी होती थी कि वे पूंजीवाद के विरूद्ध डटकर लड़ें, लेकिन आपस में निजी स्वार्थपूर्ति के लिए कदापि नहीं. लेकिन यह नारा आज ऐसे कुचक्र में फंसा हुआ है, जिसमें संगठन के नाम पर निजी स्वार्थ की रोटियां सेंकी जा रही है. और अधिकारों के संघर्ष का सौदा किया जाता है. मजदूर लोग अपनी रोजी-रोटी को दांव पर लगाकर एकता का प्रदर्शन करते हैं और हड़ताल करके सड़कों पर उतर आते हैं, लेकिन,संगठनों के नेता निजी स्वार्थपूर्ति के चलते राजनेताओं व पूंजीपतियों के हाथों अपना दीन-ईमान बेच देते हैं.

परिणामस्वरूप आम मजदूरों के अधिकारों का सुरक्षा कवच आसानी से छिन्न-भिन्न हो जाता है. वास्तविक हकीकत तो यह है कि आजकल हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि मजदूर वर्ग मालिक (पूंजीपति वर्ग) व सरकार के रहमोकर्म पर निर्भर हो चुका है. बेहतर तो यही होगा कि पूंजीपति लोग व सरकार स्वयं ही मजदूरों के हितों का ख्याल रखें,इन श्रमिकों की माँगों पर सरकार को गहन विचार-मंथन करना चाहिए यदि इस आक्रोश पर सरकार द्वारा आवश्यक कदम नहीं उठाये गये तो निश्चित तौरपर श्रमिकों का यह आक्रोश निकट भविष्य में अत्यन्त भयंकर रूप ले सकता है. सरकार को तत्काल श्रमिकों की सुध लेनी चाहिए और उनके हितों पर समुचित गौर करना चाहिए. दुनिया के जितने भी विकसित व विकासशील देश है वे श्रमिकों की बदौलत ही यहाँ तक पहुँचे है. अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों के साथ आज भारत का नाम भी आज श्रमिकों के कारण ही लिया जा रहा है.

भारत मे श्रमिकों ने औपनिवेशिक राज्य से लड़ने के लिए 1884 ई. मे एक श्रमिक संघ, श्बम्बई मिल हैण्ड ऐसोसिएशनश् की स्थापना एन.एम.लोखण्डे के नेतृत्व में की थी तब से लेकर आज तक बहुत सारे मजदूर संघ बने . जो मजदूरों को उनके अधिकार के प्रति जागरूक करने और उन्हें पूर्ण सम्मान दिलाने, सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी विधान श्रमिकों के लिए विभिन्न सामाजिक लाभों- बीमारी, प्रसूति, रोजगार सम्बन्धी आघात, प्रॉविडेण्ट फण्ड, न्यूनतम मजदूरी आदि की लडाई लडते रहते हैं .

आधुनिक श्रम विधान के कुछ महत्वपूर्ण विषय है दृ मजदूरी की मात्रा, मजदूरी का भुगतान, मजदूरी से कटौतियां, कार्य के घंटे, विश्राम अंतराल, साप्ताहिक अवकाश, सवेतन छुट्टी, कार्य की भौतिक दशायें, श्रम संघ, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल, स्थायी आदेश, नियोजन की शर्ते, बोनस, कर्मकार क्षतिपूर्ति, प्रसूति हितलाभ एवं कल्याण निधि आदि है जो सरकार को पूरा करवाना ही चाहिए. देश में कोरोना महामारी मे अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक भारत में लागू किए गए देशव्यापी लॉकडाउन से मजदूर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और उन्हें अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर होना पड़ा है संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय ने चेतावनी दी है कि कोरोना वायरस संकट के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं. यैसे मे औद्योगिक क्षेत्र केपूजीपतियों को चाहिए अपने मजदूरों को खाने पीने रहने की समुचित व्यवस्था करें क्योंकि उन्हीं मजदूरो से फिर काम लेना है येसा करने से देश तथा मजदूरों का सहयोग होगा. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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Bhartiya Basti Picture

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