कोरोना ने इन्हें कारोबार बदलने को कर दिया मजबूर, चौथे चरण में राहत की उम्मीद

कोरोना ने इन्हें कारोबार बदलने को कर दिया मजबूर, चौथे चरण में राहत की उम्मीद
Basti Lockdown

-जितेंद्र कौशल सिंह- बस्ती. पहले से ही मुफलिसी की मार झेल रहे फुटपाथी दुकानदार इस लॉक डाउन में सबसे ज्यादा त्रस्त है.अपनी छोटी सी पूजी में रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाले चाट, फास्टफूड, बर्गर, समोसा आदि बेचने वाले दुकानदार इस वैश्विक महा मारी में समझ नहीं पा रहे है कि वे करें तो क्या जायें तो कहा . सब कुछ ठप पड़ा हैं जो थोड़ी बहुत पूजी बची थी वह अपनी और परिवार के पेट की आंग शान्त करने में खत्म हो चुकी है.अब वे उपर वाले से यही प्रार्थना कर रहे है कि यह महामारी खत्म हो पटरी से उतर चुकी जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर दौडे.

लॉक डाउन शुरू होने के साथ ही ठेलों पर चाट ,बर्गर ,फास्टफूड बेचकर गुजारा करने वालों की दुकाने बंद है. लाकडाउन में मिली छूट के दौरान भी इन्हें दुकान लगाने की अनुमति नहीं मिली. ऐसी हालत में गरीबी की मार झेल रहे यह छोटे फुटपाथी दुकानदार बदहाली के दौर से गुजर रहे है. इनमें से अधिकांश ऐसे हैं जो घर से दूर शहर में किराए पर कमरा लेकर चाट, समोसा, बर्गर, चाऊमीन, मोमो आदि का ठेला लगाकर परिवार का गुजर बसर करते थे. कोरोना महामारी के बीच हुए लॉक डाउन में सब कुछ ठप हुआ तो उनके कारोबार की तरह उनका भविष्य भी अंधकारमय हो गया है. घर का किराया देने से लेकर परिवार को पालने तक की चिंता उन्हे सताने लगी है. कुछ ऐसे भी है जिन्होने इस लांकडाउन में परिवार की जीविका की चुनौती को देखते हुए सब्जी आदि बेचना शुरू कर दिया. ताकि वे जिन्दा रह सके.

इसी जद्दोजहद और खुद की रोटी के साथ परिवार को चलाने के लिए सदर ब्लाक के कृष्णा भगौती के योगेन्द्र कुमार जो पिछले कई सालों से फास्ट फुड की दुकान चलाकर अपना गुजारा कर रहे थे अब उसी ठेले पर सब्जी बेच रहे है. बताते हैं कि हजारों रूपये लगाकर आलू प्याज हरी सब्जी खरीद कर दुकान सजा तो लिया लिया लेकिन इस नये काम मे लगातार नुकसान सहना पड रहा हैं. हरी सब्जियो के जल्दी खराब हो जाने के कारण जैसे तैसे लागत ही निकल पा रही है. सब्जी के इस व्यवसाय की कोई जानकारी तो है नहीं लेकिन पेट परिवार जिन्दा रखने के लिए करें तो क्या करें.

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डारीडीहा चौराहे पर बर्गर, बड़ा पाव चाउमीन की दुकान चलाने वाले मनोज कुमार पिछले बीस दिनों तरबूज बेच रहे है. मनोज बताते हैं कि जब बर्गर, बडापाव चाउमीन की दुकान लगाते थे रोज का 400 से 500 रूपया कमा लेते थे लेकिन अब तो 100 रूपये के लिए भी तरस जाना पड रहा है. तरबूज की दुकान तो लगा लिया है लेकिन जब लोग घरों से निकलेगे तभी कुछ खरीददारी करेंगे.

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रखौना बाजार में चाट की दुकान लगा कर परिवार गुजारा करने करने वाले जग्गू प्रसाद कहते है कि जब से लॉक डाउन लगा है तब से पैसे पैसे को मोहताज है हमारे पास इतनी पूंजी भी नही है कि कुछ और कर पायें. कर्ज लेकर ठेला लगाते थे शाम को कमाकर उसी मे से पैसा वापस कर देते थे,जो बचता था उसी से गुजारा होता था. अगले दिन फिर इसी तरह जीवन की गाडी धकेल रहे थे. लेकिन अब तो यह भी नही है. कैसे जीयेगें अब भगवान ही जानें.

यह सिर्फ दो छोटें दुकानदारो का दर्द नही है, बल्कि शहर से लेकर गांव के चैराहों पर ठेला लगाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे गरीबो का है. जिन्हे लॉक डाउन के बढ़ते समय ने चिंतित कर रखा है.

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