कैसे मनेगा कोरोना काल में पर्यावरण दिवस.!
-अनूप मिश्रा- बस्ती (भा.ब.) पर्यावरण दिवस के मौके पर पौधरोपड़ की परंपरा इस साल भी मनाए जाने की तैयारी है. कागजों में लगने वाले करोड़ों पौधे भले ही बड़े न हुए हों मगर जिम्मेदारों की जेब जरूर बड़ी हो गयी है. मायावती के शासन काल में पौधरोपड़ में वल्र्ड रिकार्ड बना था. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव ने भी अपने शासन में पौधरोपड़ का इतिहास रचा.
लगभग दस सालों में मायावती काल में लगे करोड़ों पौधे अब पेड़ बन जाने थे. अखिलेश यादव की सरकार में लगे पौधे भी बड़े हो जाने थ. इसके बावजूद धरातल पर देखा जाऐ तो विभागीय उदासीनता और भ्रष्टाचार से लगे पौधे या तो सूख चुके हैं या अपनी जगह से गायब हो चुके है. ऐसे में इस साल भी लगने वाले पौधे बचे रहेंगे इसमें संशय ही है.
मजे की बात योगी अदित्यनाथ की सरकार में भी पर्यावरण संरक्षण पर जोर शोर से काम हुआ. अधिकारियों को जीरो टैगिंग के जरिए पौधरोपड़ की सूचना देने के लिए कहा गया. उसके बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला.
कोरोना काल में इस वर्ष भी पौधरोपड़ की हरियाली लहलहाने की व्यवस्था होगी. हर साल लगने वाले पौधे विभागीय उदासीनता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाते है. जिम्मेदारों पर कार्रवाई न होने से पौधरोपड़ बस कोरम बन कर रह जाता है. सरकार की मंशा हरियाली बढ़ाने पर होती है. लेकिन जिम्मेदार बस जेब की हरियाली पर ध्यान देकर सरकार की मंशा को पलीता लगाने में जुटे रहते है. देखना दिलचस्प होगा की इस बार पर्यावरण दिवस के मौके पर लगने वाले पौधे आगे चलकर बढ़ते हैं या अगली बार लगने वाले पौधों के लिए जगह छोड़ने के लिए मुरझा जाते है.
कैसे मनेगा कोरोना काल में पर्यावरण दिवस.!
-अनूप मिश्रा- बस्ती (भा.ब.) पर्यावरण दिवस के मौके पर पौधरोपड़ की परंपरा इस साल भी मनाए जाने की तैयारी है. कागजों में लगने वाले करोड़ों पौधे भले ही बड़े न हुए हों मगर जिम्मेदारों की जेब जरूर बड़ी हो गयी है. मायावती के शासन काल में पौधरोपड़ में वल्र्ड रिकार्ड बना था. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव ने भी अपने शासन में पौधरोपड़ का इतिहास रचा.
लगभग दस सालों में मायावती काल में लगे करोड़ों पौधे अब पेड़ बन जाने थे. अखिलेश यादव की सरकार में लगे पौधे भी बड़े हो जाने थ. इसके बावजूद धरातल पर देखा जाऐ तो विभागीय उदासीनता और भ्रष्टाचार से लगे पौधे या तो सूख चुके हैं या अपनी जगह से गायब हो चुके है. ऐसे में इस साल भी लगने वाले पौधे बचे रहेंगे इसमें संशय ही है.
मजे की बात योगी अदित्यनाथ की सरकार में भी पर्यावरण संरक्षण पर जोर शोर से काम हुआ. अधिकारियों को जीरो टैगिंग के जरिए पौधरोपड़ की सूचना देने के लिए कहा गया. उसके बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला.
कोरोना काल में इस वर्ष भी पौधरोपड़ की हरियाली लहलहाने की व्यवस्था होगी. हर साल लगने वाले पौधे विभागीय उदासीनता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाते है. जिम्मेदारों पर कार्रवाई न होने से पौधरोपड़ बस कोरम बन कर रह जाता है. सरकार की मंशा हरियाली बढ़ाने पर होती है. लेकिन जिम्मेदार बस जेब की हरियाली पर ध्यान देकर सरकार की मंशा को पलीता लगाने में जुटे रहते है. देखना दिलचस्प होगा की इस बार पर्यावरण दिवस के मौके पर लगने वाले पौधे आगे चलकर बढ़ते हैं या अगली बार लगने वाले पौधों के लिए जगह छोड़ने के लिए मुरझा जाते है.
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