शिक्षा में संस्कृत अनिवार्य करें

शिक्षा में संस्कृत अनिवार्य करें
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वेद प्रताप वैदिकगुजरात के शिक्षामंत्री से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ प्रमुख कार्यकर्ताओं ने अनुरोध किया है कि वे अपने प्रदेश में संस्कृत की अनिवार्य पढ़ाई शुरु करवाएं. यह मांग सिर्फ संघ के स्वयंसेवक ही क्यों कर रहे हैं और सिर्फ गुजरात के लिए ही क्यों कर रहे हैं? भारत के हर तर्कशील नागरिक को सारे भारत के लिए यह मांग करनी चाहिए, क्योंकि दुनिया में संस्कृत जैसी वैज्ञानिक, व्याकरणसम्मत और समृद्ध भाषा कोई और नहीं है. यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा तो है ही, शब्द भंडार इतना बड़ा है कि उसके मुकाबले दुनिया की समस्त भाषाओं का संपूर्ण शब्द-भंडार भी छोटा है.

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अमेरिकी संस्था 'नासाÓ के एक अनुमान के अनुसार संस्कृत चाहे तो 102 अरब से भी ज्यादा शब्दों का शब्दकोश जारी कर सकती है, क्योंकि उसकी धातुओं, लकार, कृदंत और पर्यायवाची शब्दों से लाखों नए शब्दों का निर्माण हो सकता है. संस्कृत की बड़ी खूबी यह भी है कि उसकी लिपि अत्यंत वैज्ञानिक और गणित के सूत्रों की तरह है. जैसा बोलना, वैसा लिखना और जैसा लिखना, वैसा बोलना. अंग्रेजी और फ्रेंच की तरह संस्कृत हवा में ल_ नहीं घुमाती है.

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'नासा ने अपने वैज्ञानिक अनुसंधानों और कंप्यूटर के लिए संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ भाषा बताया है. संस्कृत सचमुच में विश्व भाषा है. इसने दर्जनों एशियाई और यूरोपीय भाषाओं को समृद्ध किया है. संस्कृत को किसी धर्म-विशेष से जोडऩा भी गलत है. संस्कृत जब प्रचलित हुई, तब पृथ्वी पर न तो हिंदू, न ईसाई और न ही इस्लाम धर्म का उदय हुआ था. संस्कृत भाषा किसी जाति-विशेष की जागीर नहीं है. क्या उपनिषदों का गाड़ीवान रैक्व ब्राह्मण था? संस्कृत को पढऩे का अधिकार हर मनुष्य को है.

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औरंगजेब के भाई दाराशिकोह क्या हिंदू और ब्राह्मण थे? उन्होंने 50 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद 'सिर्रे अकबर के नाम से किया था. अब्दुल रहीम खानखाना ने 'खटकौतुकम नामक ग्रंथ संस्कृत में लिखा था. तेहरान विश्वविद्यालय में मेरे एक साथी प्रोफेसर कुरान-शरीफ का अनुवाद संस्कृत में करने लगे थे. कुछ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत 'ख्रीस्त गीता और 'ख्रीस्त भागवत भी लिखी है. कुछ अंग्रेज विद्वानों ने अब से लगभग पौने 200 साल पहले बाइबिल का संस्कृत अनुवाद 'नूतनधर्म्मनियमस्य ग्रंथसंग्रह: के नाम से प्रकाशित कर दिया था.

लगभग 40 साल पहले पाकिस्तान में मुझे एक पुणे के मुसलमान विद्वान मिले. मैं उनके घर गया. वे मुझसे लगातार संस्कृत में ही बात करते रहे. भारत में पंडित गुलाम दस्तगीर और डा. हनीफ खान जैसे संस्कृत के विद्वानों से मेरी पत्नी डॉ. वेदवती का सतत संपर्क बना रहा. अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. की संस्कृत पंडिता डॉ. सलमा महफूज ने ही दाराशिकोह के 'सिर्रे अकबर का हिंदी अनुवाद किया है. अभी भी मेरे कई परिचित मुसलमान मित्र विभिन्न विश्वविद्यालयों में संस्कृत के आचार्य हैं.

इसीलिए मेरा निवेदन है कि संस्कृत को किसी मजहब या जाति की बपौती न बनाएं. जरुरी यह है कि भारत के बच्चों को संस्कृत, उनकी उनकी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी 11 वीं कक्षा तक अवश्य पढ़ाई जाए और फिर अगले तीन साल बी.ए. में उन्हें छूट हो कि वे अंग्रेजी या अन्य कोई विदेशी भाषा पढ़ें. कोई भी विदेशी भाषा सीखने के लिए तीन साल बहुत होते हैं. उसके कारण हमारे बच्चों को संस्कृत के महान वरदान से वंचित क्यों किया जाए?

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