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                <title>विचार - Bhartiya Basti</title>
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                <title>Wayanad News: वायनाड त्रासदी से सबक लेने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[Wayanad News: वायनाड त्रासदी से सबक लेने की जरूरत,Wayanad News Need to learn lessons from Wayanad tragedy]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://bhartiyabasti.com/india-news/wayanad-news-need-to-learn-lessons-from-wayanad-tragedy/article-14665"><img src="https://bhartiyabasti.com/media/400/2024-08/wayanad-lanslide.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>-डाॅ. ओ.पी. त्रिपाठी</strong><br />केरल के वायनाड में आए भारी भूस्खलन से प्रलय मच गया है. हादसे में अब तक 300 के करीब लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, हजारों लोग घायल हैं और मलबे में दबे लोगों की तलाश चल रही है. देर रात आई आपदा ने जन-धन की हानि को बढ़ाया है. इस आपदा ने 11 साल पहले आई केदारनाथ त्रासदी की यादें ताजा कर दी हैं. जो रात में सोया था, उसे उठने तक का मौका नहीं मिला और सुबह मलबे में मिला. चारों तरफ बर्बादी ने इन गांवों की खूबसूरती को उजाड़ दिया. भूस्खलन से उपजी बड़ी मानवीय त्रासदी इस बात का प्रमाण है कि प्राकृतिक रौद्र को बढ़ाने में मानवीय हस्तक्षेप की भी बड़ी नकारात्मक भूमिका रही है. भूस्खलन और उसके बाद तेज बारिश से राहत व बचाव के कार्यों में बाधा आने से फिर स्पष्ट हुआ है कि कुदरत के रौद्र के सामने आज भी सारी मानवीय व्यवस्था बौनी साबित होती है.वैज्ञानिक बार-बार चेता रहे हैं कि भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा का पैटर्न बदलता जा रहा है. वर्षा अक्सर एक छोटे से क्षेत्र में तीव्र, अल्पकालिक या गरज के साथ हो रही है. वजह भी दक्षिण-पूर्व अरब सागर के गर्म होने की बताई जा रही है. मंगलवार को केरल जिले के वायनाड में अपने साथ किए जा रहे खिलवाड़ से गुस्साई प्रकृति भी रौद्र रूप में सामने आ गई. प्रकृति के इस रूप ने केरल की हरियाली से लबरेज उन तमाम तस्वीरों को मटियामेट कर दिया जिनके माध्यम से केरल को सर्वाधिक समृद्ध जैव विविधता वाले राज्य के रूप में पहचाना जाता है.</p>
<p>पिछले कुछ वर्षों में किए गए अध्ययन बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन और वन क्षेत्र की हानि वायनाड में विनाशकारी भूस्खलन के दो सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के बीते वर्ष जारी भूस्खलन एटलस के मुताबिक, भारत के 30 सर्वाधिक भूस्खलन-संभावित जिलों में से 10 केरल में ही थे, और वायनाड इनमें 13वें स्थान पर था. इसी में यह भी कहा गया था कि पश्चिमी घाट और तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा व महाराष्ट्र की कोंकण पहाड़ियों का 90 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है. दूसरी ओर, वायनाड में घटते वन क्षेत्र पर 2022 के एक अध्ययन से पता चलता है कि 1950 से 2018 के बीच जिले में 62 फीसदी वन गायब हो गए, जबकि बागान (प्लांटेशन) क्षेत्र में लगभग 1,800 प्रतिशत की वृद्धि हुई. जाहिर है कि वनों की कटाई से भू-भाग कमजोर हो चुका है जो तेज बारिश में बार-बार भूस्खलन की वजह बनता है.</p>
<p><br />जलवायु-परिवर्तन ने भी बारिश की स्थिति और भू-स्खलन की तीव्रता को बढ़ाया है. एक शोध में कहा गया है कि जो वायनाड साल भर बूंदाबांदी और मानसून की बारिश वाला ठंडा, नम वातावरण वाला इलाका होता था, जलवायु-परिवर्तन के कारण अब सूखा, गर्म, लेकिन मानसून के दौरान भारी, तीव्र बारिश वाला क्षेत्र बन गया है. इस बदलाव से भू-स्खलन का जोखिम बढ़ा है. 2018 के मानसून में भी खूब बारिश हुई थी, तब करीब 400 लोगों की जान चली गई थी. उसके बाद केरल में भू-स्खलन वाला क्षेत्र बढ़ गया है.</p>
<p>प्रथम दृष्टया इस तबाही को एक प्राकृतिक आपदा के रूप में वर्णित किया जा रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाके और वन क्षेत्र को लगातार हुए नुकसान जैसे कारकों के प्रभाव को भी नकारा नहीं जा सकता. उल्लेखनीय है कि बीते वर्ष भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा जारी भूस्खलन के मानचित्र के अनुसार भारत के भूस्खलन की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में दस जिले केरल में स्थित हैं. जिसमें वायनाड 13वें स्थान पर हैं.</p>
<p>वर्ष 2021 के एक अध्ययन के अनुसार केरल में सभी भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील इलाके पश्चिमी घाट में स्थित हैं. जिसमें इडुक्की, एर्नाकुलम, कोट्टायम, वायनाड, कोझिकोड और मलप्पुरम जिले शामिल हैं. जाहिर है इस चेतावनी को तंत्र ने गंभीरता से नहीं लिया.निस्संदेह, मौजूदा परिस्थितियों में जरूरी है कि विभिन्न राज्यों में ऐसी आपदाओं से बचाव की तैयारी करने और निपटने के लिये तंत्र को बेहतर ढंग से सुसज्जित करने के तौर-तरीकों पर भी युद्धस्तर पर काम किया जाए. यदि ऐसी आपदाओं से बचाव के लिये प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित कर ली जाती है तो जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है.</p>
<p>विडंबना है कि केरल के मामले में ऐसा नहीं हो पाया है. इसमें दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में देश में आपदा प्रबंधन की दिशा में प्रतिक्रियाशील तंत्र सक्रिय हुआ है और जान-माल की क्षति को कम करने में कुछ सफलता भी मिली है, लेकिन इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना बाकी है. इसके साथ ही पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रभाव के बारे में विशेषज्ञों की चेतावनियों पर ध्यान देने की जरूरत है. जिसके लिये राज्य सरकारों की सक्रियता, उद्योगों की जवाबदेही और स्थानीय समुदायों की जागरूकता की जरूरत है.</p>
<p>जाने कितनी ही बार हमने ‘ईश्वर के अपने देश’ के रूप में केरल को देखा-सुना है. यह इसलिए भी क्योंकि प्रकृति ने इस राज्य को सौंदर्य के अनगिनत विशेषणों से अलंकृत किया है. यही वजह है कि केरल घरेलू पर्यटकों के लिए सबसे पसंदीदा जगह है. वायनाड में हुए भयावह भूस्खलन की तस्वीरों ने सबको इस कद्र बेचैन कर दिया है कि अब जरूरत उन कारणों की तलाश की हो गई है जिनकी वजह से यह विनाशलीला सामने आई.</p>
<p>ऐसी आपदाएं हमें सबक देती हैं कि भले ही हम कुदरत का कोहराम न रोक सके लेकिन जन-धन की हानि को कम करने के प्रयास जरूर किये जा सकते हैं. वायनाड के इलाके में तमाम केंद्रीय व राज्य की एजेंसियां तथा सेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक राहत-बचाव कार्य में जुटे हैं. घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है और विस्थापितों को राहत शिविरों में पहुंचाया जा रहा है. साथ ही लापता लोगों को तलाशने का काम युद्ध स्तर पर जारी है. हालांकि, तेज बारिश व विषम परिस्थितियों से राहत कार्य में बाधा पहुंच रही है.</p>
<p>भारत में हर सरकार और नागरिक विकास चाहते हैं. उसके लिए जो निर्माण-कार्य किए जाते हैं, वे बेलगाम और अनियोजित हंै. खनन तक धड़ल्ले से कराया जाता है. पहाड़ को काटते-तोड़ते रहेंगे, तो ऐसे ‘प्रलय’ कैसे रोके जा सकते हैं? इस पर सोचना चाहिए. देश के अन्य हिस्सों से भी बरसाती कहर के समाचार आ रहे हैं. बिहार हर वर्ष बाढ़ के कहर से सहम जाता है. वहां पर हर वर्ष बड़ी तादाद में जान और माल का नुकसान होता है. इस कहर से बिहार को बचाने के लिए इस वर्ष के बजट में विशेष आर्थिक सहायता दी गई है. अन्य राज्यों को भी उदारता के साथ विशेष आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए. खासकर हिमाचल पिछले वर्ष भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था, और इस वर्ष भी बरसात का कहर उसने देखा है. उसे केंद्रीय मदद की सख्त जरूरत है.</p>
<p>वायनाड की त्रासदी का बड़ा सबक यह है कि हमें प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण ढंग से इस्तेमाल के प्रति नये सिरे से प्रतिबद्ध होना होगा. लेकिन विडंबना यह है कि विगत के वर्षों में वायनाड में कई बार हुई भूस्खलन की घटनाओं को राज्य शासन ने गंभीरता से नहीं लिया है. यह अच्छी बात है कि सभी राजनीतिक दलों व केंद्र तथा राज्य सरकार ने आपदा के प्रभावों से मुकाबले में एकजुटता दिखायी है. ऐसे मामलों में राजनीति होना ठीक भी नहीं है. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>India News</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Aug 2024 22:12:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhartiya Basti]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Lok Sabha Election 2024: क्या इन संस्थाओं को अपनी विश्वसनीयता की भी फ़िक्र है? </title>
                                    <description><![CDATA[Lok Sabha Election 2024: क्या इन संस्थाओं को अपनी विश्वसनीयता की भी फ़िक्र है? ,Lok Sabha Election 2024 Do these institutions even care about their credibility]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://bhartiyabasti.com/india-news/lok-sabha-election-2024-do-these-institutions-even-care-about-their-credibility/article-13564"><img src="https://bhartiyabasti.com/media/400/2023-04/basti-nagar-palika-election.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>तनवीर जाफ़री</strong><br />भारतीय संविधान में लोकतंत्र के जिन तीन स्तम्भों का ज़िक्र किया गया है वे हैं विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. यह और बात है कि मीडिया के बढ़ते दायरे व इसके बढ़ते प्रभाव के चलते इसे भी लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने लगा. जबकि संवैधानिक दृष्टि से 'चौथा स्तम्भ' नाम की कोई चीज़ नहीं है. आम अवधारणा है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहे जाने वाला भारत जिसे पिछले कुछ समय से 'मदर ऑफ़ डिमॉक्रेसी' भी कहा जा रहा है यह इन्हीं उपरोक्त चार स्तम्भों पर टिका हुआ है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु आज देश में जो हालात दिखाई दे रहे हैं उसे देखकर साफ़ लग रहा है कि अकेले विधायिका ही इस महान लोकतंत्र को अपने ही तरीक़े से संचालित व निर्देशित करना चाह रही है. इंतेहा तो यह है कि संविधान की शपथ लेने वाला कर्नाटक राज्य का भारतीय जनता पार्टी का ही एक सांसद जो एक सार्वजनिक सभा में कहता सुना गया है कि -'हिंदुओं को फ़ायदा पहुंचाने के लिए संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाया जा सकता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर यह सब बदलना है, तो सिर्फ़ लोकसभा में बहुमत के वोटों से नहीं होगा. हमें लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.' उधर भाजपा इस सांसद के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने के बजाय ख़ुद ही 'अबकी बार 400 पार' का नारा भी दे रही है.  इस पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है कि -' भाजपा का आख़िरी लक्ष्य बाबासाहेब के संविधान को ख़त्म करना है. राहुल ने कहा कि 'भाजपा सांसद का बयान कि उन्हें 400 सीट संविधान बदलने के लिए चाहिए, नरेंद्र मोदी और उनके ‘संघ परिवार’ के छिपे हुए मंसूबों का सार्वजनिक ऐलान है'.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आश्चर्य है कि एक तरफ़ तो वर्तमान सत्ता 'मदर ऑफ़ डिमॉक्रेसी' की  'आज़ादी का अमृत महोत्सव'  मनाने का उद्घोष कर रही है दूसरी तरफ़ न केवल संविधान बदलने बल्कि लोकतंत्र के स्तम्भों को भी धराशायी करने की कोशिश की जा रही है? विधायिका द्वारा अपने को ही सर्वोच्च समझते हुये कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे स्तंभों को भी पंगु बनाने की कोशिश की जा रही है. लोकतंत्र के स्वयंभू चौथे स्तंभ को तो लगभग पूरी तरह अपाहिज बनाकर उसे सत्ता की बैसाखियों पर चलने के लिये मजबूर कर दिया गया है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पूरा विश्व भारतीय मीडिया के 'गोदी मीडिया ' जैसे नये नामकरण से हतप्रभ है. यदि न्यायपालिका का कोई निर्णय संकीर्ण मानसिकता रखने वाले 'सत्ता के चाहवानों' को नहीं भाता तो वे सीधे मुख्य न्यायाधीश को अपमानित करने वाले वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहे हैं. स्वतंत्र भारत के इतिहास में न्यायपालिका ख़ासकर मुख्य न्यायाधीश का इस क़द्र अपमान होते पहले कभी नहीं देखा गया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी तरह कार्यपालिका से सम्बंधित प्रवर्तन निदेशालय व सी बी आई जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण व प्रतिष्ठित संस्थाओं को भी सत्ता कथित तौर पर अपने इशारों पर नचा रही है. प्रवर्तन निदेशालय (ई डी )पर तो यह आरोप है कि गत कुछ वर्षों में ई डी ने जिन नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई की उनमें 95 प्रतिशत विपक्षी दलों के ही नेता हैं. पिछले कुछ ही दिनों के अंदर जिस तरह हेमंत सोरेन व अरविंद केजरीवाल जैसे मुख्य मंत्री पद पर आसीन विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार किया गया और असम में हिमन्त बिश्व शर्मा और महाराष्ट्र में अजित पवार जैसे भ्रष्टाचार के आरोपियों पर सत्ता द्वारा 'नज़्र-ए-इनायत की गयी इसे देख कर भी पक्षपात व विद्वेष के पहलू साफ़ नज़र आ रहे हैं. यह भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि किस तरह E D व CBI जैसी प्रतिष्ठित व सम्मानित संस्थाओं का दुरूपयोग दल बदल करने से लेकर चुनावी बॉन्ड के नाम पर की गयी 'धन वसूली ' तक के लिये कथित रूप से किया जा रहा. कई ऐसे भी उदाहरण भी हैं कि सत्ता का 'मिशन' पूरा होते ही E D व CBI की कार्रवाई रुकवा दी गयी . यहाँ तक कि अभी भी कई प्रमुख विपक्षी नेता ऐसे हैं जो सत्ता विरोधी होने के बावजूद सिर्फ़ इसलिये खुलकर सत्ता की मुख़ालिफ़त नहीं कर पा रहे क्योंकि उन्हें E D व CBI की कार्रवाई का ख़तरा है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी तरह देश का सबसे बड़ा,सबसे प्राचीन,विश्वसनीय व सबसे प्रतिष्ठित बैंक स्टेटबैंक ऑफ़ इण्डिया इसी सत्ता के दबाव में आकर अपनी साख गँवा बैठा. 2 जून 1806 को बैंक ऑफ़ कलकत्ता के नाम से गठित वर्तमान स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया या SBI ने इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में अपनी प्रतिष्ठा दांव दी है . अनुमानतः इस विशाल उपक्रम में क़रीब 260033 कर्मचारी कार्यरत हैं.  वर्तमान में 20,400 शाखाओं  व लगभग 64,000 से अधिक एटीएम / एवं आहरण मशीन की सुविधा प्रदान करने वाले देश के इस सबसे बड़े बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्डने मामले में चल रही सुनवाई के दौरान 6 मार्च को दायर एक याचिका में पहले तो इसका विस्तृत ब्यौरा देने में अपनी असमर्थता जताते हुए 30 जून तक की मोहलत मांगी थी, जिसे 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और अगले दिन 12 मार्च तक यानी 24 घंटों में ही ब्यौरा पेश करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा SBI पर बरती गयी सख़्ती का नतीजा यह हुआ कि इसी दौरान शेयर मार्केट में 6 घंटे के कारोबार के दौरान SBI का शेयर मूल्य गिर गया. देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई के शेयर मूल्य में उस समय तेज़ गिरावट देखी गई. एक ही दिन में इसके मार्केट कैपिटलाइजेशन में 13,075 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. और निवेशकों के 13,075 करोड़ रुपए हवा में उड़ गये.ज़ाहिर है ऐसी स्थिति तभी आती है जब किसी संस्थान या उपक्रम पर विश्वसनीयता का संकट गहराता है और लोगों का विश्वास उठ जाता है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यपालिका से संबंधित सभी संस्थाओं व संस्थानों व उपक्रमों को आँखें मूँद कर या सरकार के दबाव में आकर काम करने के बजाय अपने विवेक से तथा निष्पक्ष तरीक़े से काम करना चाहिये.  आज जो लोग सरकारें चला रहे हैं और लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों को ध्वस्त करना चाह रहे हैं कोई ज़रूरी नहीं कि यही हमेशा सत्ता में रहें परन्तु सत्ता के इशारों पर नाचने वाली E D,CBI,SBI जैसी अनेक संस्थाओं के प्रमुखों को यह फ़िक्र ज़रूर करनी चाहिये कि इन्हीं स्वार्थी सत्ताधारियों की वजह से देश विदेश में इन संस्थाओं की जो विश्वसनीयता धूमिल हो रही है क्या उसकी भरपाई यह दाग़दार स्वार्थी व सत्ता के भूखे राजनेता कभी कर सकेंगे ? <strong>(यह लेखक के निजी विचार हैं.)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>India News</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 Mar 2024 11:27:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anoop Mishra]]></dc:creator>
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